मुकुट गिर जानेपर श्यामवर्ण, नवयुवक अर्जुन ऊँचे शिखरवाले नीलगिरिके समान शोभा पाने लगे। उस समय उन्हें तनिक भी व्यथा नहीं हुई। वे अपने केशोंको सफेद वस्त्रसे बाँधकर युद्धके लिये डटे रहे। श्वेत वस्त्रसे केश बाँधनेके कारण वे शिखरपर फैली हुई सूर्यदेवकी किरणोंसे प्रकाशित होनेवाले उदयाचलके समान सुशोभित हुए ।। गोकर्णा सुमुखी कृतेन इषुणा गोपुत्रसम्प्रेषिता गोशब्दात्मजभूषणं सुविहितं सुव्यक्तगो5सुप्र भम् । दृष्टवा गोगतकं जहार मुकुट गोशब्दगोपूरि वै गोकर्णासनमर्दनश्न न ययावप्राप्य मृत्योर्वशम्,अंशुमाली सूर्यके पुत्र कर्णने जिसे चलाया था, जो अपने ही द्वारा उत्पादित एवं सुरक्षित बाणरूपधारी पुत्रके रूपमें मानो स्वयं उपस्थित हुई थी, गौ अर्थात् नेत्रेन्द्रियसे कानोंका काम लेनेके कारण जो गोकर्णा (चक्षु:श्रवा) और मुखसे पुत्रकी रक्षा करनेके कारण सुमुखी कही गयी है, उस सर्पिणीने तेज और प्राणशक्तिसे प्रकाशित होनेवाले अर्जुनके मस्तकको घोड़ोंकी लगामके सामने लक्ष्य करके (चलनेपर भी रथ नीचा होनेसे उसे न पाकर) उनके उस मुकुटको ही हर लिया, जिसे ब्रह्माजीने स्वयं सुन्दररूपसे इन्द्रके मस्तकका भूषण बनाया था और जो सूर्यसदृश किरणोंकी प्रभासे जगत्को परिपूर्ण (प्रकाशित) करनेवाला था। उक्त सर्पको अपने बाणोंकी मारसे कुचल देनेवाले अर्जुन उसे पुनः आक्रमणका अवसर न देनेके कारण मृत्युके अधीन नहीं हुए
sañjaya uvāca |
mukuṭa-gire jāne para śyāma-varṇaḥ nava-yuvakaḥ arjunaḥ ūrdhva-śikhara-vān nīla-giri-sadṛśaṃ śobhāṃ prāpa | tasmin kāle tasya tan-mātram api vyathā na babhūva | sa keśān śveta-vastrena baddhvā yuddhāya sthitaḥ | śveta-vastra-baddha-keśatvāt sa śikhare prasṛtābhiḥ sūrya-kiraṇaiḥ prakāśita-udayācalavat suśobhitavān ||
aṃśumālinaḥ sūryasya putreṇa karṇena kṛtena iṣuṇā goputra-samprerṣitā | go-śabdātmaja-bhūṣaṇaṃ su-vihitaṃ su-vyaktaṃ su-prabham | dṛṣṭvā go-gatakaṃ jahāra mukuṭaṃ go-śabda-gopūr iva | gokarṇāsana-mardanaś ca na yayau prāpya mṛtyor vaśam ||
सञ्जय उवाच—किरीटपाते स श्यामो युवा अर्जुनो नीलगिरिशिखर इव शुशुभे; न चास्य तदा किञ्चिद् व्यथा बभूव। स सितवस्त्रेण केशान् बद्ध्वा युद्धाय स्थितवान्; श्वेतबन्धनात् शिरसि प्रसृतैः सूर्यरश्मिभिः स उदयाचल इव विराजितः। अथांशुमतः पुत्रः कर्णः सर्प इव स्वयम्भूरिव वेगवान् बाणं मुमोच। स बाणः पार्थस्य शिरो लक्ष्यीकृत्य प्राणान् न जहार, केवलं तु तद् इन्द्रशिरोभूषणं ब्रह्मणा सुसंस्कृतं सूर्यसमप्रभं किरीटं जहार। अर्जुनस्तु स्वबाणैः तादृशान् सर्पोपमान् शरान् मर्दयितुं समर्थः, शत्रवे पुनरवसरं न दत्त्वा मृत्योर्वशं न जगाम।
संजय उवाच
The verse highlights kṣatriya steadiness under loss and shock: even when a prized emblem (the diadem) is taken, Arjuna does not collapse into grief or fear. Ethical strength here is self-mastery—maintaining resolve, protecting one’s duty in battle, and not giving the opponent a second opening.
Karna shoots a powerful arrow aimed at Arjuna’s head. It does not kill Arjuna but knocks away his radiant diadem—described as a divine ornament made by Brahmā for Indra. Arjuna, unshaken, ties his hair with a white cloth and continues fighting, shining like the sunrise mountain.