विशिष्टतरमेव त्वं कर्तुमहसि पाण्डव । “कुन्तीनन्दन! जिस मार्गपर कायर चला करते हैं, उसीपर तुम भी न चलो; क्योंकि तुम युद्धकर्ममें विशिष्ट वीरके रूपमें विख्यात हो। पाण्डुनन्दन! तुम्हें तो अपने-आपको और भी विशिष्ट ही सिद्ध करना चाहिये || ११० है || प्रकीर्णकेशे विमुखे ब्राह्म॒णेडथ कृताञज्जलौ
viśiṣṭataram eva tvaṁ kartum arhasi pāṇḍava | prākīrṇakeśe vimukhe brāhmaṇe ’tha kṛtāñjalau ||
विशिष्टतरमेव त्वं कर्तुमर्हसि पाण्डव॥
संजय उवाच