तदनन्तर जो मरनेसे बच गये थे, वे आपके पुत्र और कौरव-सैनिक कर्णको छोड़कर तथा मारे गये और बाणोंसे घायल हो सगे-सम्बन्धियोंको पुकारनेवाले अपने पुत्रों एवं पिताओंकी भी उपेक्षा करके वहाँसे भाग गये ।। (सर्वे प्रणेशु: कुरवो विभिन्ना: पार्थेषुभि: सम्परिकम्पमाना: । सुयोधनेनाथ पुनर्वरिष्ठा: प्रचोदिता: कर्णरथानुयाने ।। अर्जुनके बाणोंसे संतप्त और क्षत-विक्षत हो समस्त कौरवयोद्धा जब वहाँसे भाग खड़े हुए, तब दुर्योधनने उनमेंसे श्रेष्ठ वीरोंको पुन: कर्णके रथके पीछे जानेके लिये आज्ञा दी। दुर्योधन उवाच भो क्षत्रिया: शूरतमास्तु सर्वे क्षात्रे च धर्मे निरता: स्थ यूयम् । न युक्तरूपं भवतां समीपात् पलायन कर्णमिह प्रहाय ।। दुर्योधन बोला--क्षत्रियो! तुम सब लोग शूरवीर हो, क्षत्रियधर्ममें तत्पर रहते हो। यहाँ कर्णको छोड़कर उसके निकटसे भाग जाना तुम्हारे लिये कदापि उचित नहीं है। संजय उवाच तवात्मजेनापि तथोच्यमाना: पार्थेषुभि: सम्परितप्यमाना: । नैवावतिष्ठन्त भयाद् विवर्णा: क्षणेन नष्टा: प्रदिशो दिशश्ष ।।) संजय कहते हैं--राजन्! आपके पुत्रके इस प्रकार कहनेपर भी वे योद्धा वहाँ खड़े न हो सके। अर्जुनके बाणोंसे उन्हें बड़ी पीड़ा हो रही थी। भयसे उनकी कान्ति फीकी पड़ गयी थी; इसलिये वे क्षणभरमें दिशाओं और उनके कोनोंमें जाकर छिप गये। स सर्वतः प्रेक्ष्य दिशो विशून्या भयावदीर्ण: कुरुभिविहीन: । न विव्यथे भारत तत्र कर्ण: प्रह्दष्ट एवार्जुनम भ्यधावत्,भारत! भयसे भागे हुए कौरवयोद्धाओंसे परित्यक्त हो सम्पूर्ण दिशाओंको सूनी देखकर भी वहाँ कर्ण अपने मनमें तनिक भी व्यथित नहीं हुआ। उसने पूरे हर्ष और उत्साहके साथ ही अर्जुनपर धावा किया
sañjaya uvāca
tavātmajena api tathocyamānāḥ pārtheṣubhiḥ samparitapyamānāḥ |
naivāvatiṣṭhanti bhayād vivarṇāḥ kṣaṇena naṣṭāḥ pradiśo diśaś ca ||
sa sarvataḥ prekṣya diśo viśūnyā bhayāvadīrṇaḥ kurubhivihīnaḥ |
na vivyathe bhārata tatra karṇaḥ prahṛṣṭa evārjunam abhyadhāvat ||
एवं तवात्मजेनोक्ताः पार्थपुत्रैः समन्ततः परितप्यमानाः। भयेन विवर्णाः क्षणेन नष्टाः प्रदिशो दिशश्चैव विविशुः॥ स सर्वतः प्रेक्ष्य दिशो विशून्याः पलायितैः कुरुभिरुत्सृज्यमानः। न विव्यथे भारत तत्र कर्णः प्रहृष्टचित्तोऽर्जुनमभ्यधावत्॥
संजय उवाच
The passage highlights how fear dissolves collective resolve, while true kṣatriya-dharma is shown in steadfastness: Karṇa does not abandon the fight even when deserted, choosing duty and honor over safety.
Despite Duryodhana’s exhortation, many Kaurava warriors—pained by the Pāṇḍavas’ arrows—panic and scatter. Karṇa, left effectively alone, surveys the emptied field and then, undaunted and energized, charges directly at Arjuna.