रथी द्विपस्थेन हतो5पतच्छरै: क्राथाधिप: पर्वतजेन दुर्जय: । सवाजिसूतेष्वसनध्वजस्तथा यथा महावातहतो महाद्रुम:,तदनन्तर जैसे आँधीका उखाड़ा हुआ विशाल वृक्ष पृथ्वीपर गिर जाता है, उसी प्रकार घोड़े, सारथि, धनुष और ध्वजसहित दुर्जय महारथी क्राथ नरेश हाथीपर बैठे हुए एक पर्वतीय वीरके बाणोंसे मारा जाकर रथसे नीचे जा गिरा
sañjaya uvāca |
rathī dvipasthena hato ’patac charaiḥ krāthādhipaḥ parvatajena durjayaḥ |
savājisūteṣv asanadhvajas tathā yathā mahāvātahato mahādrumaḥ ||
सञ्जय उवाच— द्विपस्थेन पर्वतजेन वीर्यवता शरैर्हतः क्राथाधिपो दुर्जयो महारथः रथात् अपतत्। सवाजिसूतेष्वसनध्वजस्तथा महावातहतो महाद्रुम इव भूमौ पपात।
संजय उवाच