किरीटथधारी अर्जुनके उत्तम बाणोंसे आहत होकर नित्य मद बहानेवाले, कवचधारी एवं मंगलमय लक्षणोंसे युक्त चार सौ रोषभरे हाथी धराशायी हो गये। उन हाथियोंपर सुवर्णमय कवच और सोनेके आभूषण धारण करनेवाले योद्धा बैठे थे और क्रूर स्वभाववाले महावत उन्हें अपने पैरोंकी एड़ियों तथा अँगूठोंसे आगे बढ़नेकी प्रेरणा दे रहे थे। उन सबके साथ गिरे हुए वे हाथी जीव-जन्तुओंसहित धराशायी हुए महान् पर्वतके शिखरोंके समान सब ओर पड़े थे। अर्जुनके बाणोंसे विशेष घायल होकर गिरे हुए उन गजराजोंके शरीरोंसे रणभूमि ढक गयी थी ।। समन्ताज्जलदप्रख्यान् वारणान् मदवर्षिण: । अभिपेदे<र्जुनरथो घनान् भिन्दन्निवांशुमान्,जैसे अंशुमाली सूर्य बादलोंको छिन्न-भिन्न करते हुए प्रकाशित हो उठते हैं, उसी प्रकार अर्जुनका रथ सब ओरसे मेघोंकी घटाके समान काले मदस्रावी गजराजोंको विदीर्ण करता हुआ वहाँ आ पहुँचा था
samantāj jaladaprakhyān vāraṇān madavarṣiṇaḥ | abhipede 'rjunaratho ghanān bhindann ivāṃśumān ||
समन्ताज्जलदप्रख्यान् वारणान् मदवर्षिणः । अभिपेदेऽर्जुनरथो घनान् भिन्दन्निवांशुमान् ॥
संजय उवाच
The verse highlights how steadfast resolve and trained prowess, aligned with one’s dharma, can cut through overwhelming opposition; at the same time, it implicitly reminds the listener of war’s brutal consequences, even when fought for a righteous end.
Sañjaya describes Arjuna’s chariot driving into a mass of rutting war-elephants, splitting and scattering them; the imagery compares Arjuna’s advance to the sun breaking through and tearing apart dense clouds.