तां विदार्य महासेनां शरै: संनतपर्वभि: । निश्चक्राम रणाद् भीमो मत्स्यो जालादिवाम्भसि,यह देख भीमसेन झुकी हुई गाँठवाले बाणोंसे उस विशाल सेनाको विदीर्ण करके उसी प्रकार उसके घेरेसे बाहर निकल आये, जैसे कोई-कोई मत्स्य पानीमें डाले हुए जालको छेदकर बाहर निकल जाता है
तां विदार्य महासेनां शरैः संनतपर्वभिः। निश्चक्राम रणाद् भीमो मत्स्यो जालादिवाम्भसि॥
संजय उवाच