मनुष्यवाजिमातड्न् प्रहिण्वन्तं यमक्षयम् । शरै: सौभद्रमायान्तं दहन्तमिव वाहिनीम्,'सखे! सुभद्राका वीरपुत्र अभिमन्यु साँड़के समान बड़े-बड़े नेत्रोंसे सुशोभित तथा कुरुकुल एवं वृष्णिवंशके यशको बढ़ानेवाला था। उसके कंधे साँड़के कंधोंके समान मांसल थे। वह द्रोणाचार्य, अश्वत्थामा और कृपाचार्य आदि नरश्रेष्ठ वीरोंको पीड़ा दे रहा था। हाथियोंको महावतों और सवारोंसे, महारथियोंको रथोंसे, घोड़ोंको सवारोंसे तथा पैदल सैनिकोंको अस्त्र-शस्त्र एवं जीवनसे वंचित कर रहा था। सेनाओंका विध्वंस और महारथियोंको व्यथित करके वह मनुष्यों, घोड़ों और हाथियोंको यमलोक भेज रहा था। बाणोंद्वारा शत्रुसेनाको दग्ध-सी करके आते हुए सुभद्राकुमारको जो दुर्योधनके छ: क्रूर महारथियोंने मार डाला और उस अवस्थामें मारे गये अभिमन्युको जो मैंने अपनी आँखोंसे देखा, वह सब मेरे अंगोंको दग्ध किये देता है। प्रभो! मैं तुमसे सत्यकी शपथ खाकर कहता हूँ कि उसमें भी दुष्टात्मा कर्णका ही द्रोह काम कर रहा था
sañjaya uvāca |
manuṣyavājimātaṅgān prahiṇvantaṁ yamākṣayam |
śaraiḥ saubhadram āyāntaṁ dahantam iva vāhinīm ||
मनुष्यवाजिमातङ्गान् प्रहिण्वन्तं यमक्षयम् । शरैः सौभद्रमायान्तं दहन्तमिव वाहिनीम् ॥ सञ्जय उवाच—सौभद्रः शरैः परसैन्यं दहन्निव, मनुष्याश्वगजान् यमक्षयम् प्रहिण्वन्, यमलोकं प्रति नयन् इवाभ्यायात्।
संजय उवाच
The verse highlights the moral tension of righteous warfare: even when a warrior fights for a just cause, the battlefield turns him into a force of death. It invites reflection on dharma under extreme conditions—valor and duty coexist with the terrible cost inflicted on living beings.
Sañjaya reports to Dhṛtarāṣṭra that Abhimanyu advances fiercely, striking down soldiers and mounts—men, horses, and elephants—so effectively that he appears like ‘inexhaustible Yama,’ and the enemy host seems to burn under his arrows.