कर्णनिधनवृत्तान्तनिवेदनम् | Reporting Karṇa’s Fall to Yudhiṣṭhira
जानासि दाशार्ह मम व्रतं त्वं यो मां ब्रूयात् कश्नन मानुषेषु । अन्यस्मै त्वं गाण्डिवं देहि पार्थ त्वत्तोउस्त्रैर्वा वीर्यतो वा विशिष्ट:,दशाईकुलनन्दन! आप तो यह जानते ही हैं कि मेरा व्रत क्या है? मनुष्योंमेंसे जो कोई भी मुझसे यह कह दे कि 'पार्थ! तुम अपना गाण्डीव धनुष किसी दूसरे ऐसे पुरुषको दे दो जो अस्त्रोंके ज्ञान अथवा बलमें तुमसे बढ़कर हो; तो केशव! मैं उसे बलपूर्वक मार डालूँ।' इसी प्रकार भीमसेनको कोई “मूँछ-दाढ़ीरहित” कह दे तो वे उसे मार डालेंगे, वृष्णिवीर! राजा युधिष्ठिरने आपके सामने ही बारंबार मुझसे कहा है कि “तुम अपना धनुष दूसरेको दे दो'
jānāsi dāśārha mama vrataṁ tvaṁ yo māṁ brūyāt kaścana mānuṣeṣu | anyasmai tvaṁ gāṇḍīvaṁ dehi pārtha tvatto 'strair vā vīryato vā viśiṣṭaḥ ||
अर्जुन उवाच—जानासि दाशार्ह मम व्रतं त्वं, यो मां ब्रूयात् कश्चन मानुषेषु। ‘अन्यस्मै त्वं गाण्डिवं देहि पार्थ, त्वत्तोऽस्त्रैर्वा वीर्यतो वा विशिष्टः’—इति वाक्यं यः प्रयुञ्जीत, केशव, तं बलात् हन्याम्। किन्तु राजा युधिष्ठिरः तव सन्निधौ पुनः पुनर्मां ब्रवीति—‘अन्यस्मै गाण्डिवं देहि’ इति॥
अर्जुन उवाच