(भीमस्य पुत्र: समराग्रयायी महास्त्रविच्चापि तवानुरूप: । यत्नं समासाद्य रिपोर्बलं नो निमीलिताक्षं भयविप्लुतं भवेत् ।। 'भीमसेनका वह पुत्र समरभूमिमें आगे चलनेवाला, महान् अस्त्रवेत्ता और तुम्हारे समान ही पराक्रमी था। उसके होनेपर हमारे शत्रुओंकी सेना यत्न करके भी सफल न होती और भयसे व्याकुल होकर आँखें बंद कर लेती। चकार यो5सौ निशि युद्धमेक- स्त्यक्त्वा रणं यस्य भयादू द्रवन्ते । स चेत् समासाद्य महानुभाव: कर्ण रणे बाणगणै: प्रमोहा[ । धैर्ये स्थितेनापि च सूतजेन शकक््त्या हतो वासवदत्तया तया ।।) “उस महानुभाव वीरने अकेले ही रात्रिमें युद्ध किया था, जिससे शत्रुसैनिक भयके मारे रणभूमि छोड़कर भागने लगे थे। उसने कर्णपर आक्रमण करके रणभूमिमें अपने बाणसमूहोंद्वारा सबको मोहमें डाल दिया था; परंतु धैर्यमें स्थित हुए सूतपुत्र कर्णने इन्द्रकी दी हुई उस शक्तिके द्वारा उसे मार डाला। मम हााभाग्यानि पुरा कृतानि पापानि नूनं बलवन्ति युद्धे,“निश्चय ही मेरे अभाग्य और पूर्वकृत पाप इस युद्धमें प्रबल हो रहे हैं। दुरात्मा कर्णने संग्राममें तुम्हें तितकेके समान समझकर मेरा ऐसा अपमान किया है। किसी शक्तिहीन तथा बन्धु-बान्धवोंसे रहित असहाय मनुष्यके साथ जैसा बर्ताव किया जाता है, कर्णने वैसा ही मेरे साथ किया है
sañjaya uvāca |
(bhīmasya putraḥ samarāgrayāyī mahāstravic cāpi tavānurūpaḥ |
yatnaṃ samāsādya ripor balaṃ no nimīlitākṣaṃ bhayaviplutaṃ bhavet ||
cakāra yo 'sau niśi yuddham ekaḥ tyaktvā raṇaṃ yasya bhayād dravanti |
sa cet samāsādya mahānubhāvaḥ karṇa raṇe bāṇagaṇaiḥ pramohā[ ] |
dhairye sthitenāpi ca sūtajena śaktyā hato vāsavadattayā tayā ||)
भीमस्य पुत्रः समराग्रयायी महास्त्रविच्चापि तवानुरूपः । यत्नं समासाद्य रिपोर्बलं नो निमीलिताक्षं भयविप्लुतं भवेत् ॥ योऽसौ निशि युद्धमेकस्त्यक्त्वा रणं यस्य भयादुद्रवन्ते । स चेत् समासाद्य महानुभावः कर्णं रणे बाणगणैः प्रमोहयत् ॥ धैर्ये स्थितेनापि च सूतजेन शक्त्या हतो वासवदत्तया तया ॥ मम दुर्भाग्यानि पुरा कृतानि पापानि नूनं बलवन्ति युद्धे ॥
संजय उवाच
The passage highlights how, in war, even exceptional valor and mastery can be overturned by forces beyond ordinary merit—divine boons, strategic asymmetry, and the ripening of prior deeds—raising ethical reflection on power, fairness, and the human cost of victory.
Sañjaya describes Bhīma’s son (Ghaṭotkaca) as a terrifying vanguard who fought fiercely—especially at night—causing enemy troops to flee. He attacks Karṇa and confounds the battlefield with arrow-showers, but Karṇa remains steady and kills him using the Śakti weapon bestowed by Indra.