अस्त्रयुद्धे द्रौणिपार्थसंघर्षः — Karṇa’s Bhārgavāstra and the Search for Yudhiṣṭhira
Chapter 45
गान्धारिभिरसम्भ्रान्तै: पर्वतीयैश्न दुर्जयै: शलभानामिव व्रातैः पिशाचैरिव दुर्दशै:,उनके साथ कभी घबराहटमें न पड़नेवाले गान्धारदेशीय सैनिक और दुर्जय पर्वतीय वीर भी थे। पिशाचोंके समान उन योद्धाओंकी ओर देखना कठिन हो रहा था और वे टिड्डीदलोंके समान यूथ बनाकर चलते थे
गान्धारिभिरसम्भ्रान्तैः पर्वतीयैश्च दुर्जयैः । शलभानामिव व्रातैः पिशाचैरिव दुर्दशैः ॥
संजय उवाच