Karṇa’s advance against the Pāṇḍava host; Arjuna’s clash with the Saṃśaptakas (कर्णस्य पाण्डवसेनाप्रवेशः—अर्जुनस्य संशप्तकसंप्रहारः)
पृथ्वीपते! सोनेका बना हुआ पुर स्वर्गलोकमें स्थित हुआ। चाँदीका अन्तरिक्षलोकमें और लोहेका भूलोकमें स्थित हुआ; जो आज्ञाके अनुसार सर्वत्र विचरनेवाला था ।। एकैकं॑ योजनशतं विस्तारायामत: समम् | गृहाद्टालकसंयुक्तं बहुप्राकारतोरणम्,निबोध मनसा चात्र न ते कार्या विचारणा । दुर्योधन बोला--मद्रराज! मैं पुन: आपसे जो कुछ कह रहा हूँ, उसे सुनिये। प्रभो! पूर्वकालमें देवासुर-संग्रामके अवसरपर जो घटना घटित हुई थी तथा जिसे महर्षि मार्कण्डेयने मेरे पिताजीको सुनाया था, वह सब मैं पूर्णरूपसे बता रहा हूँ। राजर्षिप्रवर! आप मन लगाकर इसे सुनिये, इसके विषयमें आपको कोई अन्यथा विचार नहीं करना चाहिये तप उग्र॑ समास्थाय नियमे परमे स्थिता: । उस समय देवताओंने दैत्योंको परास्त कर दिया था, यह हमारे सुननेमें आया है। राजन! दैत्योंके परास्त हो जानेपर तारकासुरके तीन पुत्र ताराक्ष, कमलाक्ष और विद्युन्माली उग्र तपस्याका आश्रय ले उत्तम नियमोंका पालन करने लगे प्रत्येक नगरकी लंबाई-चौड़ाई बराबर-बराबर सौ योजनकी थी। सबमें बड़े-बड़े महल और अट्टालिकाएँ थीं। अनेकानेक प्राकार (परकोटे) और तोरण (फाटक) सुशोभित थे
pṛthvīpate! saunakaṃ bāṇa-bhūtaṃ puraṃ svargaloke sthitaṃ babhūva | cāndīkam antarikṣaloke lohakaṃ bhūloke sthitam; yad ājñānusāreṇa sarvatra vicarati sma || ekaikaṃ yojanaśataṃ vistārāyāmataḥ samam | gṛhāṭṭālakasaṃyuktaṃ bahu-prākāra-toraṇam, nibodha manasā cātra na te kāryā vicāraṇā ||
दुर्योधन उवाच—पृथ्वीपते! काञ्चनं पुरं स्वर्गलोके स्थितम्; राजतं चान्तरिक्षलोके; आयसं च भूलोके स्थितम्। तानि च पुराणकाले वरदत्ताज्ञया सर्वत्र विचरन्ति स्म प्रसिद्धानि। एकैकं योजनशतं विस्तारायामतः समं, गृहैः प्रासादैश्चाट्टालकसंयुक्तं, बहुप्राकारतोरणं च। एतन्मनसा निबोध; न तेऽत्र विचारणा कार्या।
दुर्योधन उवाच
The passage uses a mythic example of extraordinarily fortified, boon-protected cities to underscore how power and protection can arise from granted authority and disciplined conditions—yet such grandeur can also feed pride and strategic persuasion in a war context.
Duryodhana addresses a king and recounts an ancient episode about three immense cities—gold in heaven, silver in the mid-region, and iron on earth—describing their vast dimensions and fortifications, and urging the listener to accept his account without doubt.