समागतानि चैतानि यो हन्याद् भगवंस्तदा । एकेषुणा देववर: स नो मृत्युर्भविष्यति,निबोध मनसा चात्र न ते कार्या विचारणा । दुर्योधन बोला--मद्रराज! मैं पुन: आपसे जो कुछ कह रहा हूँ, उसे सुनिये। प्रभो! पूर्वकालमें देवासुर-संग्रामके अवसरपर जो घटना घटित हुई थी तथा जिसे महर्षि मार्कण्डेयने मेरे पिताजीको सुनाया था, वह सब मैं पूर्णरूपसे बता रहा हूँ। राजर्षिप्रवर! आप मन लगाकर इसे सुनिये, इसके विषयमें आपको कोई अन्यथा विचार नहीं करना चाहिये तप उग्र॑ समास्थाय नियमे परमे स्थिता: । उस समय देवताओंने दैत्योंको परास्त कर दिया था, यह हमारे सुननेमें आया है। राजन! दैत्योंके परास्त हो जानेपर तारकासुरके तीन पुत्र ताराक्ष, कमलाक्ष और विद्युन्माली उग्र तपस्याका आश्रय ले उत्तम नियमोंका पालन करने लगे अनघ! तदनन्तर एक हजार वर्ष पूर्ण होनेपर हमलोग एक-दूसरेसे मिलेंगे। भगवन्! ये तीनों पुर जब एकत्र होकर एकीभावको प्राप्त हो जाय, उस समय जो एक ही बाणसे इन तीनों पुरोंको नष्ट कर सके, वही देवेश्वर हमारी मृत्युका कारण होगा
samāgatāni caitāni yo hanyād bhagavaṁs tadā | ekeṣuṇā devavaraḥ sa no mṛtyur bhaviṣyati, nibodha manasā cātra na te kāryā vicāraṇā ||
दुर्योधन उवाच—भगवन्, यदा एतानि (त्रीणि पुराणि) समागच्छन्ति, तदा यः एकेषुणा तानि विनाशयितुं शक्नुयात्, स देववरः अस्माकं मृत्युः भविष्यति। एतन्मनसा निबोध; अत्र ते न कर्तव्या विचारणा।
दुर्योधन उवाच
Even seemingly invincible protections based on conditions and clever safeguards remain vulnerable to a higher power and to the ripening of fate; clinging to certainty and forbidding reflection (“no deliberation”) can signal pride and moral blindness in counsel.
Duryodhana cites a well-known mythic condition: when the three strongholds unite, only a supreme divine archer who can destroy them with a single arrow will be their death. He urges his listener to accept this point firmly and not to doubt it, using the exemplum to frame the present war’s stakes and inevitabilities.