कर्णपर्व — पञ्चदशोऽध्यायः | Karṇa Parva, Chapter 15: Pāṇḍya’s Advance and Aśvatthāmā’s Counterstroke
इस प्रकार बाणोंके महान् समुदायसे श्रीकृष्ण और अर्जुनको घायल करके आनन्दित हुआ द्रोणकुमार महान् मेघोंके गम्भीर घोषके समान गर्जना करने लगा ।। (तैः पतद्धिर्महाराज द्रौणिमुक्तै: समनन््ततः । संछादितौ रथस्थौ तावुभौ कृष्णधनंजयौ ।। महाराज! अश्व॒त्थामाके धनुषसे छूटकर सब ओर गिरनेवाले उन बार्णोद्वारा रथपर बैठे हुए श्रीकृष्ण और अर्जुन दोनों ढक गये। तत: शरशतैस्ती%णैर्भारद्वाज: प्रतापवान् । निश्चैष्टी तावुभी चक्रे रणे माधवपाण्डवौ ।। तत्पश्चात् प्रतापी भरद्वाजकुलनन्दन अभश्व॒त्थामाने सैकड़ों तीखे बाणोंसे रणभूमिमें श्रीकृष्ण और अर्जुन दोनोंको निश्रेष्ट कर दिया। हाहाकृतमभूत् सर्व स्थावरं जड़म॑ तथा | चराचरस्य गोप्तारौ दृष्टवा संछादितौ शरै: ।। चराचरकी रक्षा करनेवाले उन दोनों महापुरुषोंको बाणोंद्वारा आच्छादित देख समस्त स्थावर-जंगम जगत्में हाहाकार मच गया। सिद्धचारणसंघाश्न सम्पेतुर्वे समनन््ततः । अपि स्वस्ति भवेदद्य लोकानामिति चाब्रुवन् ।। सिद्ध और चारणोंके समुदाय सब ओरसे वहाँ आ पहुँचे और बोले--“आज तीनों लोकोंका मंगल हो'। न मया तादृशो राजन दृष्टपूर्व: पराक्रम: । संजज्ञे यादृशो द्रौणे: कृष्णा छादयतो रणे ।। राजन! मैंने इससे पहले अभश्वत्थामाका वैसा पराक्रम नहीं देखा था, जैसा कि रणभूमिमें श्रीकृष्ण और अर्जुनको आच्छादित करते समय प्रकट हुआ था। द्रौणेस्तु धनुष: शब्द रथानां त्रासनं रणे । अश्रौषं बहुशो राजन् सिंहस्य नदतो यथा ।। नरेश्वर! रणभूमिमें द्रोणकुमारके धनुषकी टंकार बड़े-बड़े रथियोंको भयभीत करनेवाली थी। दहाड़ते हुए सिंहके समान उसके शब्दको मैंने बहुत बार सुना था। ज्या चास्य चरतो युद्धे सव्यं दक्षिणमस्यत: । विद्युदम्भो धरस्येव भ्राजमाना व्यदृश्यत ।। युद्धमें विचरते हुए अश्वत्थामाके धनुषकी प्रत्यंचा बायें-दायें बाण छोड़ते समय बादलमें बिजलीके समान चमकती दिखायी देती थी। स तदा क्षिप्रकारी च दृढहस्तश्न पाण्डव: । प्रमोहं परम गत्वा प्रेक्षत्नास्ते धनंजय: ।। शीघ्रता करने और दृढ़तापूर्वक हाथ चलानेवाले पाण्डुपुत्र धनंजय उस समय भारी मोहमें पड़कर केवल देखते रह गये थे। विक्रमं च हृतं मेने आत्मनस्तेन संयुगे । तदास्य समरे राजन् वपुरासीत् सुदुर्दशम् ।। द्रौणेस्तत् कुर्वतः कर्म यादृगूपं पिनाकिन: । उन्हें युद्धमें ऐसा मालूम होता था कि अअभश्वत्थामाने मेरा पराक्रम हर लिया है। राजन! उस समय समरांगणमें वैसा पराक्रम करते हुए द्रोणकुमार अश्वत्थामाका शरीर ऐसा डरावना हो गया था कि उसकी ओर देखना कठिन हो रहा था। पिनाकपाणि भगवान् रुद्रका जैसा रूप दिखायी देता है, वैसा ही उसका भी था। वर्धमाने ततस्तत्र द्रोणपुत्रे विशाम्पते ।। हीयमाने च कौन्तेये कृष्णं रोष: समाविशत् | प्रजानाथ! जब वहाँ द्रोणपुत्र बढ़ने लगा और कुन्तीकुमारका पराक्रम घटने लगा, तब श्रीकृष्णको बड़ा रोष हुआ। सरोषान्नि:श्वसन् राजन् निर्दहन्निव चक्षुषा ।। द्रौणिं ददर्श संग्रामे फाल्गुनं च मुहुर्मुहु: । ततः क्रुद्धो5ब्रवीत् कृष्ण: पार्थ सप्रणयं वच: ।। राजन! वे क्रोधपूर्वक लंबी साँस खींचते हुए संग्रामभूमिमें अश्वत्थामाकी ओर इस प्रकार देखने लगे, मानो उसे अपनी दृष्टिद्वारा दग्ध कर देंगे। अर्जुनकी ओर भी वे बारंबार दृष्टिपात करने लगे। फिर कुपित हुए श्रीकृष्णने अर्जुनसे प्रेमपूर्वक कहा। श्रीभगवानुवाच अत्यद्भुतमहं पार्थ त्वयि पश्यामि संयुगे । यत् त्वां विशेषयत्याजौ द्रोणपुत्रो5द्य भारत ।। कच्चित्ते गाण्डिवं हस्ते मुष्टिरवा न व्यशीर्यत । कच्चिद् वीर्य यथापूर्व भुजयोरवा बल॑ तव ।। उदीर्यमाणं हि रणे पश्यामि द्रौणिमाहवे । श्रीभगवान् बोले--पार्थ! भरतनन्दन! मैं इस युद्धमें तुम्हारे अंदर यह अत्यन्त अद्भुत परिवर्तन देख रहा हूँ कि आज द्रोणकुमार रणभूमिमें तुमसे आगे बढ़ा जा रहा है। क्या तुम्हारे हाथमें गाण्डीव धनुष है? या तुम्हारी मुट्ठी ढीली पड़ गयी? कया तुम्हारी दोनों भुजाओंमें पहलेके समान ही बल और पराक्रम है? क्योंकि इस समय संग्राममें द्रोणपुत्रको मैं तुमसे बढ़ा-चढ़ा देख रहा हूँ। गुरुपुत्र इति होनं मानयन् भरतर्षभ । उपेक्षां मा कृथा: पार्थ नायं कालो हा पेक्षितुम् ।।) भरतश्रेष्ठ! यह मेरे गुरुका पुत्र है, ऐसा समझकर इसे सम्मान देते हुए तुम इसकी उपेक्षा न करो। पार्थ! यह उपेक्षाका अवसर नहीं है। तस्य तं निनदं श्र॒ुत्वा पाण्डवो<च्युतमब्रवीत् । पश्य माधव दौरात्म्यं गुरुपुत्रस्य मां प्रति,(भगवान् श्रीकृष्णका यह कथन तथा) अश्वत्थामाके उस सिंहनादको सुनकर पाण्डुपुत्र अर्जुनने श्रीकृष्णसे कहा--“माधव! देखिये तो सही गुरुपुत्र अश्वत्थामा मेरे प्रति कैसी दुष्टता कर रहा है?
sañjaya uvāca |
iti prakāraṃ bāṇānāṃ mahān samūhaḥ śrīkṛṣṇaṃ cārjunaṃ ca ghātayitvā ānandito droṇakumāro mahāmeghānāṃ gambhīraghoṣa iva garjitum ārabdhavān ||
सञ्जय उवाच—एवं शरसमूहैर्महता श्रीकृष्णार्जुनौ विद्ध्वा द्रोणपुत्रोऽश्वत्थामा हृष्टः सञ्जज्ञे। स च गम्भीरमेघनिनादसदृशं नादं कृत्वा रणभूमौ ननाद।
संजय उवाच