धृष्टद्युम्नस्य द्रोणरथारोহণं सात्यकेः प्रतिरक्षणं च | Dhrishtadyumna Boards Droṇa’s Chariot; Sātyaki’s Counter-Protection
यदि पुत्र न पश्यामि यास्यामि यमसादनम् । “जिसके केशप्रान्त कोमल और घुँघराले थे, दोनों नेत्र मृगछौनेके समान चंचल थे, जिसका पराक्रम मतवाले हाथीके समान और शरीर नूतन शालवृक्षके समान ऊँचा था, जो मुसकराकर बातें करता था, जिसका मन शान्त था, जो सदा गुरुजनोंकी आज्ञाका पालन करता था, बाल्यावस्थामें भी जिसके पराक्रमकी कोई तुलना नहीं थी, जो सदा प्रिय वचन बोलता और किसीसे ईर्ष्या-द्वेष नहीं रखता था, जिसमें महान् उत्साह भरा था, जिसकी भुजाएँ बड़ी-बड़ी और दोनों नेत्र विकसित कमलके समान सुन्दर एवं विशाल थे, जो भक्तजनोंपर दया करता, इन्द्रियोंको वशमें रखता और नीच पुरुषोंका साथ कभी नहीं करता था, जो कृतज्ञ, ज्ञानवान्, अस्त्र-विद्यामें पारंगत, युद्धसे मुँह न मोड़नेवाला, युद्धका अभिनन्दन करनेवाला तथा सदा शत्रुओंका भय बढ़ानेवाला था, जो स्वजनोंके प्रिय और हितमें तत्पर तथा अपने पितृकुलकी विजय चाहनेवाला था, संग्राममें जिसे कभी घबराहट नहीं होती थी और जो शत्रुपर पहले प्रहार नहीं करता था, अपने उस पुत्र बालक अभिमन्युको यदि नहीं देखूँगा तो मैं भी यमलोककी राह लूँगा
sañjaya uvāca | yadi putra na paśyāmi yāsyāmi yamasādanam |
यदि पुत्रं न पश्यामि यास्यामि यमसादनम्।
संजय उवाच
The verse underscores how attachment and grief can overwhelm even the wise, and how war’s adharma-like consequences include the destruction of virtuous youth; it implicitly warns that dharmic qualities do not guarantee safety amid collective violence.
In Drona Parva’s battle context, the speaker expresses a death-wish if he cannot see his son; the surrounding description (as preserved in the edition’s explanatory passage) praises the son’s character and prowess, intensifying the pathos of impending or realized loss.