धृष्टद्युम्नस्य द्रोणरथारोহণं सात्यकेः प्रतिरक्षणं च | Dhrishtadyumna Boards Droṇa’s Chariot; Sātyaki’s Counter-Protection
अकाल (प्रतिज्ञापर्व) द्विसप्ततितमो< ध्याय: अभिमन्युकी मृत्युके कारण अर्जुनका विषाद और क्रोध (धृतराष्ट्र वाच अथ संशप्तकै: सार्ध युध्यमाने धनंजये । अभिमनयौ हते चापि बाले बलवतां वरे ।। महर्षिसत्तमे याते युधिष्ठिरपुरोगमा: । पाण्डवा: किमथाकार्षु: शोकेन हतचेतस: ।। कथं संशप्तकेभ्यो वा निवृत्तो वानरध्वज: । केन वा कथित: तस्य प्रशान्त: सुतपावक: ।। एतन्मे शंस तत्त्वेन सर्वमेवेह संजय ।) धृतराष्ट्रने पूछा--संजय! जब अर्जुन संशप्तकोंके साथ युद्ध कर रहे थे, जब बलवानोंमें श्रेष्ठ बालक अभिमन्यु मारा गया और जब महर्षियोंमें श्रेष्ठ व्यास (युधिष्ठिरको सान्त्वना देकर) चले गये, तब शोकसे व्याकुल चित्तवाले युधिष्ठिर और अन्य पाण्डवोंने क्या किया? कपिध्वज अर्जुन संशप्तकोंकी ओरसे कैसे लौटे तथा किसने उनसे कहा कि तुम्हारा अग्निके समान तेजस्वी पुत्र सदाके लिये शान्त हो गया। इन सब बातोंको तुम यथार्थरूपसे मुझे बताओ। संजय उवाच तस्मिन्नहनि निर्वत्ति घोरे प्राणभृतां क्षये । आदित्येउस्तं गते श्रीमान् संध्याकाल उपस्थिते,संजय बोले--भरतश्रेष्ठ! प्राणधारियोंका संहार करनेवाले उस भयंकर दिनके बीत जानेपर जब सूर्यदेव अस्ताचलको चले गये और संध्याकाल उपस्थित हुआ, उस समय समस्त सैनिक जब शिविरमें विश्रामके लिये चल दिये, तब विजयशील श्रीमान् कपिध्वज अर्जुन अपने दिव्यास्त्रोंद्रारा संशप्तकसमूहोंका वध करके अपने उस विजयी रथपर बैठे हुए शिविरकी ओर चले। चलते-चलते ही वे अश्रुगदुगदकण्ठ हो भगवान् गोविन्दसे इस प्रकार बोले---
sañjaya uvāca |
tasminn ahani nirvṛtte ghore prāṇabhṛtāṃ kṣaye |
āditye 'staṃ gate śrīmān sandhyākāla upasthite ||
धृतराष्ट्र उवाच—अथ संशप्तकैः सार्धं युध्यमाने धनञ्जये, अभिमन्यौ हते चापि बाले बलवतां वरे। महर्षिसत्तमे याते युधिष्ठिरपुरोगमाः पाण्डवाः किमथाकुर्वन् शोकेन हतचेतसः? कथं संशप्तकेभ्यो वा निवृत्तो वानरध्वजः? केन वा कथितं तस्य प्रशान्तः सुतपावकः? एतन्मे शंस तत्त्वेन सर्वमेवेह संजय॥ संजय उवाच—तस्मिन्नहनि निर्वृत्ते घोरे प्राणभृतां क्षये, आदित्येऽस्तं गते श्रीमान् सन्ध्याकाल उपस्थिते, शिविरं प्रति सर्वेषु सैन्येषु विश्रान्तये गतेषु, कपिध्वजः संशप्तकगणान् दिव्यास्त्रैर्निहत्य विजयी रथमारुह्य शिविरं प्रति जगाम। गच्छन्नेवाश्रुगद्गदकण्ठो गोविन्दं प्रति वाक्यमब्रवीत्॥
संजय उवाच
The verse underscores the moral weight of war by framing the day as a ‘destruction of living beings’ and then marking sunset as a natural boundary where action pauses and consequences—grief, reflection, and accountability—begin to surface.
Sanjaya sets the scene immediately after a horrific day of fighting: the sun has set and twilight has come. This signals a shift from battlefield action to the evening developments that follow—especially the emotional and strategic reactions to the day’s losses.