Adhyāya 64 — Omens, Conch Signals, and Arjuna’s Assault on the Elephant Division
महर्षिलोग उनके ऊपर प्रसन्न होकर उनके कार्योका अनुमोदन करते हुए कहते थे कि असंख्य दक्षिणा देनेवाले राजा अम्बरीष जैसा यज्ञ कर रहे हैं, वैसा न तो पहलेके राजाओंने किया और न आगे कोई करेंगे ।। स चेन्ममार सृञ्जय चतुर्भद्रतरस्त्वया । पुत्रात् पुण्यतरस्तुभ्यं मा पुत्रमनुतप्यथा: । अयज्वानमदाक्षिण्यमश्रि श्रैत्येत्युदाहरत्,वैत्य सृंजय! वे पूर्वोक्त चारों कल्याणकारी गुणोंमें तुमसे बढ़-चढ़कर थे और तुम्हारे पुत्रकी अपेक्षा भी अधिक पुण्यात्मा थे। जब वे भी जीवित न रह सके, तब दूसरोंकी तो बात ही क्या है? अतः तुम यज्ञ और दान-दक्षिणासे रहित अपने पुत्रके लिये शोक न करो। ऐसा नारदजीने कहा
nārada uvāca | sa cen mamāra sṛñjaya caturbhadrataras tvayā | putrāt puṇyataras tubhyaṃ mā putram anutapyathāḥ || ayajvān amadākṣiṇyam aśrī śraity ety udāharat, vaitya sṛñjaya! ve pūrvokta cāro kalyāṇakārī guṇeṣuṃ tvayā vardhamānāḥ, putrāt api puṇyātmatarāḥ | yadā te ’pi jīvituṃ na śekuḥ, anyeṣāṃ tu kathāiva kā | ataḥ putraṃ prati śokaṃ mā kṛthāḥ, yajña-dāna-dakṣiṇā-rahitam iti ||
नारद उवाच—स चेन्ममार सृञ्जय चतुर्भद्रतरस्त्वया। पुत्रात् पुण्यतरस्तुभ्यं मा पुत्रमनुतप्यथाः॥ अयज्वानमदाक्षिण्यम्—अतः शोकं परित्यज।
नारद उवाच