नत्वां वक्ष्यामि परुषं हनिष्ये त्वां वधक्षमम् । संजय कहते हैं--राजन्! इस प्रकार कितने ही क्रूर एवं कठोर वचन धृष्टद्युम्नने श्रीमान् सात्यकिको सुनाये। उन्हें सुनकर वे क्रोधसे काँपने लगे। उनकी आँखें लाल हो गयीं तथा उन्होंने सर्पषके समान लंबी साँस खींचकर धनुषको तो रथपर रख दिया और हाथमें गदा उठा ली। फिर वे धृष्टद्युम्नके पास पहुँचकर बड़े रोषके साथ इस प्रकार बोले--“अब मैं तुझसे कठोर वचन नहीं कहूँगा। तू वधके ही योग्य है, अतः तुझे मार ही डालूँगा || ४५-- ४७३ || तमापतन्तं सहसा महाबलममर्षणम्,अवलप्लुत्य रथात् तूर्ण बाहुभ्यां समवारयत् | महाबली, अमर्षशील एवं अत्यन्त क्रोधमें भरे हुए यमराज-तुल्य सात्यकि जब सहसा कालस्वरूप धृष्टद्युम्नकी ओर बढ़े, तब भगवान् श्रीकृष्णकी आज्ञासे महाबली भीमसेनने तुरंत ही रथसे कूदकर उन्हें दोनों हाथोंसे रोक लिया
sañjaya uvāca | na tvāṃ vakṣyāmi paruṣaṃ haniṣye tvāṃ vadhakṣamam | tam āpatantaṃ sahasā mahābalam amarṣaṇam, avalaplutya rathāt tūrṇaṃ bāhubhyāṃ samavārayat |
संजय उवाच— न त्वां वक्ष्यामि परुषं; हनिष्ये त्वां वधक्षमम्। तमापतन्तं सहसा महाबलममर्षणम् अवलप्लुत्य रथात् तूर्णं बाहुभ्यां समवारयत्। महाबली यमराजतुल्यः सात्यकिः क्रोधसमाविष्टः पाञ्चाल्यं प्रति यदा धावति स्म, तदा भगवतः श्रीकृष्णस्याज्ञया भीमसेनः शीघ्रं रथादवप्लुत्य तं बाहुभ्यां निरुद्धवान्।
संजय उवाच
Uncontrolled rage turns conflict into personal vengeance; therefore, even in war, ethical restraint and obedience to wise counsel (here, Kṛṣṇa’s command) are necessary to prevent adharma and needless escalation.
Sātyaki, provoked by Dhṛṣṭadyumna’s harsh words, resolves to stop speaking and instead kill him. As he charges forward in fury, Bhīma—on Kṛṣṇa’s instruction—jumps from the chariot and physically restrains Sātyaki to prevent immediate violence.