ततो<स्य सशरं चापं क्षुरप्रेण द्विधाच्छिनत्,इसके बाद उसने क्षुरप्रसे सात्यकिके बाणसहित धनुषको काटकर उसके दो टुकड़े कर डाले। तब सात्यकिने दूसरा सुदृढ़ धनुष हाथमें लेकर शीघ्रतापूर्वक हाथ चलाते हुए वहाँ आपके पुत्रपर बाणोंकी श्रेणियाँ बरसानी आरम्भ कर दीं
tato 'sya saśaraṃ cāpaṃ kṣurapreṇa dvidhācchinat
सञ्जय उवाच—ततोऽस्य सशरं चापं क्षुरप्रेण द्विधाच्छिनत्। अथ सात्यकिः शीघ्रं दृढमन्यत् कार्मुकमादाय लघुहस्तः तव सुतं प्रति शरवर्षं मुमोच।
संजय उवाच