शून्यैश्न नगराकारैरहतयोधध्वजै रथै: । अमनुष्य्यैस्त्रस्तै: कृष्पमाणैस्ततस्तत:,उस समय योद्धाओंके कटे हुए हाथ, पैर, कुण्डलमण्डित मस्तक, धनुष, बाण, प्रास, खड्ग, परशु, पट्टिश, नालीक, छोटे नाराच, नखर, शक्ति, तोमर, अन्यान्य नाना प्रकारके साफ किये हुए उत्तम आयुध, भाँति-भाँतिके विचित्र कवच, टूटे हुए विचित्र रथ तथा मारे गये हाथी, घोड़े, इधर-उधर पड़े थे। वायुके समान वेगशाली, सारथिशून्य, भयभीत घोड़े जिन्हें बारंबार इधर-उधर खींच रहे थे, जिनके रथी योद्धा और ध्वज नष्ट हो गये थे, ऐसे नगराकार सुनसान रथ भी वहाँ दृष्टिगोचर हो रहे थे। आभूषणोंसे विभूषित वीरोंके मृतशरीर यत्र-तत्र गिरे हुए थे, काटकर गिराये हुए व्यजन, कवच, ध्वज, छत्र, आभूषण, वस्त्र, सुगन्धित फूलोंके हार, रत्नोंके हार, किरीट, मुकुट, पगड़ी, किंकिणीसमूह, छातीपर धारण की जानेवाली मणि, सोनेके निष्क और चूड़ामणि आदि वस्तुएँ भी इधर-उधर बिखरी पड़ी थीं। इन सबसे भरा हुआ वह युद्धस्थल वहाँ नक्षत्रोंसे व्याप्त आकाशके समान सुशोभित हो रहा था
sañjaya uvāca |
śūnyaiś ca nagarākārair ahatayoddhadhvajai rathaiḥ |
amanūṣyaiḥ trastaiḥ kṛṣyamāṇais tatas tataḥ ||
सञ्जय उवाच—तत्र नगराकाराः रथाः शून्याः ससारथिवर्जिताः, हतयोधध्वजाः, त्रस्तैरिवामनुष्यैः अश्वैः पुनः पुनरितस्ततः कृष्यमाणाः, मोहात् समन्तात् वेगेन धावन्तो दृश्यन्ते स्म।
संजय उवाच
The verse underscores the moral and existential cost of war: when warriors fall and standards are destroyed, even the proud instruments of power (great chariots) become empty shells, driven by fear and disorder—an image of impermanence and the collapse of human control amid violence.
Sañjaya describes the battlefield scene: massive chariots, once commanded by heroes and marked by banners, now roam empty as frightened horses pull them erratically in different directions after their riders and standards have been destroyed.