वासवी-शक्तेः प्रयोगः, घटोत्कच-वधोत्तर-शोकः, व्यासोपदेशश्च
The Vāsavī Spear’s Use, Post-Ghaṭotkaca Grief, and Vyāsa’s Counsel
वीक्ष्य दीप्तमिवायान्तं रिपुविक्षो भकारिणम् | तमुद्यतमहाचापं राक्षसेन्द्रं घटोत्कचम्,वह देखनेमें पर्वत-शिखरके समान जान पड़ता था। उसका रूप भयानक होनेके कारण वह सबको भयंकर प्रतीत होता था। उसका मुख यों ही बड़ा भीषण था; किंतु दाढ़ोंक कारण और भी विकराल हो उठा था। उसके कान कील या खूँटेके समान जान पड़ते थे। ठोढ़ी बहुत बड़ी थी। बाल ऊपरकी ओर उठे हुए थे। आँखें डरावनी थीं। मुख आगके समान प्रज्वलित था, पेट भीतरकी ओर धँसा हुआ था। उसके गलेका छेद बहुत बड़े गड़्ढेके समान जान पड़ता था। सिरके बाल किरीटसे ढके हुए थे। वह मुँह बाये हुए यमराजके समान समस्त प्राणियोंके मनमें त्रास उत्पन्न करनेवाला था। शत्रुओंको क्षुब्ध कर देनेवाले प्रजजलित अग्निके समान राक्षसराज घटोत्कचको विशाल धनुष उठाये आते देख आपके पुत्रकी सेना भयसे पीड़ित एवं क्षुब्ध हो उठी, मानो वायुसे विक्षुब्ध हुई गंगामें भयानक भँवरें और ऊँची-ऊँची लहरें उठ रही हों
sañjaya uvāca | vīkṣya dīptam ivāyāntaṃ ripuvikṣobhakāriṇam | tam udyata-mahācāpaṃ rākṣasendraṃ ghaṭotkacam ||
सञ्जय उवाच—दीप्तमिवायान्तं रिपुविक्षोभकारिणम् । तमुद्यतमहाचापं राक्षसेन्द्रं घटोत्कचम् ॥ पर्वतशिखरप्रख्यं घोररूपं भयावहम् । विवृतास्यं यमप्रख्यं सर्वभूतभयङ्करम् ॥ तं दृष्ट्वा कौरवानीकं भयत्रस्तं व्यचालयत् । वायुना क्षोभिते गङ्गे भयानकावर्तसङ्कुला इव ॥
सयजय उवाच
The verse highlights how fear and morale shape outcomes in war: a single formidable presence can destabilize an army. Ethically, it also underscores the Mahābhārata’s tension between righteous aims and terrifying means—power may be effective, yet it can spread dread and chaos beyond the battlefield.
Sañjaya describes Ghaṭotkaca advancing with his great bow raised, appearing like blazing fire and like Death. His terrifying appearance causes Duryodhana’s forces to become frightened and violently agitated, compared to the Gaṅgā roiled by wind into whirlpools and high waves.