अध्याय १४८ — कर्णप्रभावः, धृष्टद्युम्नस्य विरथता, तथा घटोत्कच-आह्वानम्
Chapter 148: Karṇa’s Pressure, Dhṛṣṭadyumna Unhorsed, and the Summoning of Ghaṭotkaca
देवराज इन्द्रके समान रथपर बैठे हुए सम्पूर्ण शस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ नरश्रेष्ठ अर्जुन एक ही साथ सम्पूर्ण दिशाओंमें महान् अस्त्रोंका प्रहार करते हुए सबके लिये दर्शनीय हो रहे थे। वे अपने धनुषकी टंकार करते हुए रथके मार्गोपर नृत्य-सा कर रहे थे। जैसे आकाशगमें तपते हुए दोपहरके सूर्यकी ओर देखना कठिन होता है, उसी प्रकार उनकी ओर राजालोग यत्न करनेपर भी देख नहीं पाते थे ।। दीप्तोग्रसम्भूतशर: किरीटी विरराज ह । वर्षास्विवोदीर्णजल: सेन्द्रधन्वाम्बुदो महान्,प्रलीनमीनमकरं सागराम्भ इवाभवत् | संजय कहते हैं--राजन्! उस समय अर्जुनके द्वारा खींचे जानेवाले गाण्डीव धनुषकी अत्यन्त भयंकर टंकार यमराजकी सुस्पष्ट गर्जना तथा इन्द्रके वज्रकी गड़गड़ाहटके समान जान पड़ती थी। उसे सुनकर आपकी सेना भयसे उद्विग्न हो बड़ी घबराहटमें पड़ गयी। उस समय उसकी दशा प्रलयकालकी आँधीसे क्षोभको प्राप्त एवं उत्ताल तरंगोंसे परिपूर्ण हुए उस महासागरके जलकी-सी हो गयी, जिसमें मछली और मगर आदि जलजन्तु छिप जाते हैं प्रज्वलित एवं भयंकर बाण लिये किरीटधारी अर्जुन वर्षा-ऋतुमें अधिक जलसे भरे हुए इन्द्रधनुषघसहित महामेघके समान सुशोभित हो रहे थे
sañjaya uvāca | dīptograsambhūtaśaraḥ kirīṭī virarāja ha | varṣāsv ivodīrṇajalaḥ sendradhanvām̐budo mahān | pralīnamīnamakaraṃ sāgarāmbha ivābhavat |
सञ्जय उवाच—राजन्, देवराज इन्द्र इव रथस्थः सर्वशस्त्रभृतां श्रेष्ठो नरश्रेष्ठः किरीटी धनञ्जयः युगपत् सर्वदिक्षु महास्त्राणि प्राहरत्, धनुर्ज्यातलनादं कुर्वन् रथमार्गेषु नृत्यन्निव दृश्यत। मध्यंदिनसूर्यं प्रतपन्तमिवाम्बरे यथा द्रष्टुं दुष्करं, तथा तं राजानो यत्नवन्तोऽपि न ददृशुः। तस्य गाण्डीवटङ्कारः यमस्य गर्जनां शक्रवज्रनिनादं च सममिवाभात्; तं श्रुत्वा तव सेना भयविह्वला प्रलयवातक्षोभिते सागरे प्रलीनमीनमकरं जलमिवाभवत्। दीप्तोग्रसम्भूतशरः किरीटी वर्षास्विवोदीर्णजलः सेन्द्रधन्वाम्बुदो महानिव विरराज।
संजय उवाच
The verse highlights kṣatriya-dharma expressed as disciplined martial excellence: righteous force, when wielded with mastery and purpose, can decisively shift the moral and psychological balance of war. It also underscores the ethical reality of battle—fear, mortality, and consequence—through images of Yama (death) and the overwhelming, unavoidable power of a storm.
Sañjaya describes Arjuna’s battlefield dominance: he fires torrents of arrows in all directions, his bow’s sound terrifies the Kaurava forces, and his appearance is compared to a monsoon cloud with a rainbow, while the enemy army is likened to an ocean thrown into chaos where creatures hide.