धृष्टद्युम्नस्य द्रोणाभिमुख्यं तथा सात्यकि-कर्ण-समागमः
Dhṛṣṭadyumna’s advance toward Droṇa and the Sātyaki–Karṇa confrontation
स्वै: परैश्न समेतेभ्य: सात्वतेन च संगमे । एकस्यैकेन हि कथं संग्राम: सम्भविष्यति,तुम स्वयं कवच हिलाते हुए रथपर चढ़े थे, धनुषकी प्रत्यंचा खींचते थे और अपने बहुसंख्यक शत्रुओंके साथ युद्ध कर रहे थे। इस प्रकार रथ, हाथी, घुड़सवार और पैदलोंसे भरे हुए सिंहनादकी भैरव गर्जनासे व्याप्त गम्भीर सैन्य-समुद्रमें जहाँ अपने और शत्रुपक्षके एकत्र हुए लोगोंका परस्पर युद्ध चल रहा था, तुम्हारी सात्यकिके साथ मुठभेड़ हुई थी। ऐसे तुमुल युद्धमें किसी भी एक योद्धाका एक ही योद्धाके साथ संग्राम कैसे माना जा सकता है?
Arjuna uvāca: svaiḥ paraiś ca sametebhyaḥ sātvatenā ca saṅgame | ekasyaikena hi kathaṃ saṅgrāmaḥ sambhaviṣyati ||
अर्जुन उवाच— स्वैः परैश्च समेतेभ्यः सात्वतेन च संगमे, एकस्यैकेन हि कथं संग्रामः सम्भविष्यति? बहूनां समवाये प्रवृत्ते रणकोलाहले ‘एकयुद्ध’ इति वचनं न युक्तम्।
अर्जुन उवाच