द्रोणेन केकय-चेदि-वीरवधः
Droṇa’s engagements with the Kekayas and Cedis
शरोर्मिणं ध्वजावर्त नागनक्रं दुरत्ययम् । पदातिमत्स्यकलिलं शड्खदुन्दुभिनि:स्वनम्,उस समय अर्जुनने उस असंख्य, अपार, दुर्लड्घ्य एवं अक्षोभ्य रण-समुद्रको सीमावर्ती तटप्रान्तके समान होकर अपने बाणोंद्वारा रोक दिया। उस रणसागरमें बाणोंकी तरंगें उठ रही थीं, फहराते हुए ध्वज भौंरोंके समान जान पड़ते थे, हाथी ग्राह थे, पैदल सैनिक मत्स्य और कीचड़के समान प्रतीत होते थे, शंखों और दुन्दुभियोंकी ध्वनि ही उस रणसिन्धुकी गम्भीर गर्जना थी, रथ ऊँची-ऊँची लहरोंके समान जान पड़ते थे, योद्धाओंकी पगड़ी और टोप कछुओंके समान थे, छत्र और पताकाएँ फेनराशि-सी प्रतीत होती थीं तथा मतवाले हाथियोंकी लाशें ऊँचे-ऊँचे शिलाखण्डोंके समान उस सैन्यसागरको व्याप्त किये हुए थीं
sañjaya uvāca | śarormiṇaṁ dhvajāvarta nāganakraṁ duratyayam | padātimatsyakalilaṁ śaṅkhadundubhiniḥsvanam ||
संजय उवाच—दुरत्ययोऽसौ रणसागरः समुद्र इवाभवत्। तत्र शराः तरङ्गा इव, ध्वजाः आवर्ता इव, गजाः नक्रा इव; पदातयः पङ्ककलिले मत्स्या इव संकुलाः। शङ्खदुन्दुभिनिनादश्च तस्य रणसिन्धोर्गम्भीरः गर्जित इवाभवत्॥
संजय उवाच