अक्षरब्रह्मयोगः | Akṣara-Brahma-Yoga
The Yoga of the Imperishable Brahman
सम्बन्ध-- योगसिद्धिके लिये मनको वशमें करना परम आवश्यक बतलाया गया। इसपर यह जिज्ञासा होती है कि जियका मन वशर्में नहीं है; किंतु योगमों श्रद्धा होनेके कारण जो भगवत्प्राप्तिके लिये साधन करता है, उसकी मरनेके बाद क्या गति होती है; इसीके लिये अर्जुन पूछते हैं-- अजुन उवाच अयति: श्रद्धयोपेतो योगाच्चलितमानस: । अप्राप्य योगसंसिद्धि कां गतिं कृष्ण गच्छति,अर्जुन बोले--हे श्रीकृष्ण! जो योगमें श्रद्धा रखनेवाला है, किंतु संयमी नहीं है, इस कारण जिसका मन अन्तकालमें योगसे विचलित हो गया है,* ऐसा साधक योगकी सिद्धिको अर्थात् भगवत्साक्षात्कारको न प्राप्त होकर किस गतिको प्राप्त होता है?
arjuna uvāca | ayatiḥ śraddhayopeto yogāc calita-mānasaḥ | aprāpya yoga-saṁsiddhiṁ kāṁ gatiṁ kṛṣṇa gacchati ||
अर्जुन उवाच—अयतिः श्रद्धयोपेतो योगाच्चलितमानसः । अप्राप्य योगसंसिद्धिं कां गतिं कृष्ण गच्छति ॥
अजुन उवाच