कर्मयोग–ज्ञानयज्ञ–अवतारोपदेश
Karma-Yoga, Jñāna-Yajña, and Avatāra Instruction
सम्बन्ध-- अब भगवान् 4वह कैसे बैठता है?” इस तीसरे प्रश्नका उत्तर देते हैं यदा संहरते चायं कूर्मो5ड्रानीव सर्वश: । इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेभ्यस्तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता,कछुआ सब ओरसे अपने अंगोंको जैसे समेट लेता है, वैसे ही जब यह पुरुष इन्ट्रियोंके विषयोंसे इन्द्रियोंको सब प्रकारसे हटा लेता है, तब उसकी बुद्धि स्थिर है (ऐसा समझना चाहिये)
Arjuna uvāca: yadā saṁharate cāyaṁ kūrmo ’ṅgānīva sarvaśaḥ | indriyāṇīndriyārthebhyas tasya prajñā pratiṣṭhitā ||
यदा संहरते चायं कूर्मोऽङ्गानीव सर्वशः । इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेभ्यस्तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता ॥
अजुन उवाच