भीष्मरथाभिमुख्यं — Arjuna’s advance with Śikhaṇḍin; Duḥśāsana’s interception
सर्वलोकेश्चरा: शूरास्तत्र तत्र विशाम्पते । विप्रद्रुता व्यदृश्यन्त प्राकृता इव मानवा:,प्रजानाथ! कितने ही रथी रथोंसे हीन हो गये थे। वे कवच, कुण्डल और पगड़ी धारण किये बड़े तेजस्वी दिखायी देते थे। उन सबने कण्ठमें स्वर्णमय पदक और भुजाओंमें बाजूबंद धारण कर रखे थे। वे देखनेमें देवकुमारोंके समान सुन्दर और युद्धमें इन्द्रके समान शौर्यसम्पन्न थे। वे समृद्धिमें कुबेर और नीतिज्ञतामें बृहस्पतिजीसे भी बढ़कर थे। ऐसे सर्वलोकेश्वर शूरवीर भी रथहीन हो गँवार मनुष्योंकी भाँति जहाँ-तहाँ भागते दिखायी देते थे
sañjaya uvāca | sarvalokeścarāḥ śūrās tatra tatra viśāmpate | vipradrutā vyadṛśyanta prākṛtā iva mānavāḥ ||
सर्वलोकेषु विख्याताः शूरास्तत्र तत्र भारत। रथहीनाः समासाद्य विप्रद्रुता व्यदृश्यन्त॥ प्राकृता इव मानुषाः सङ्ग्रामे भीमदर्शने।
संजय उवाच