Adhyāya 104 — Śikhaṇḍin-puraskāraḥ (Śikhaṇḍin as Vanguard) and Bhīṣma’s Counter-Advance
पुष्पितै: किंशुकै राजन् संस्तीर्ण इव पर्वत: । वे बाण राक्षसके शरीरको विदीर्ण करके उसके मर्मस्थानोंमें धँस गये। राजन्! उन बाणोंसे सम्पूर्ण अंगोंके क्षत-विक्षत हो जानेपर राक्षसराज अलम्बुष खिले हुए पलाशके वृक्षोंसे आच्छादित पर्वतकी भाँति सुशोभित होने लगा
पुष्पितैः किंशुकै राजन् संस्तीर्ण इव पर्वतः। तैर्बाणै राक्षसस्य शरीरं विदार्य मर्मसु निपतितेषु, सर्वाङ्गक्षतविक्षतः स राक्षसराजोऽलम्बुषः पुष्पितकिंशुकैः आच्छादित इव पर्वतः शोभामगात्॥
संजय उवाच