Adhyāya 90: Babhruvāhana’s Reception and the Commencement of Yudhiṣṭhira’s Aśvamedha
उष्णार्तश्न क्षुधार्तश्न विप्रस्तपसि संस्थित:,क्षपयामास तं काल कृच्छ॒प्राणो द्विजोत्तम: । तपस्यामें लगे हुए वे ब्राह्मणदेवता गर्मी और भूख दोनोंसे कष्ट पा रहे थे। भूख और परिश्रमसे पीड़ित होनेपर भी वे उज्छ न पा सके। उन्हें अन्नका एक दाना भी नहीं मिला; अतः परिवारके सभी लोगोंके साथ उसी तरह भूखसे पीड़ित रहकर ही उन्होंने वह समय काटा। वे श्रेष्ठ ब्राह्मण बड़े कष्टसे अपने प्राणोंकी रक्षा करते थे
Nakula uvāca: uṣṇārtaś ca kṣudhārtaś ca vipras tapasi saṁsthitaḥ, kṣapayāmāsa taṁ kālaṁ kṛcchra-prāṇo dvijottamaḥ.
नकुल उवाच— उष्णार्तश्च क्षुधार्तश्च विप्रस्तपसि संस्थितः। क्षपयामास तं कालं कृच्छ्रप्राणो द्विजोत्तमः॥
नकुल उवाच