Ulūpī–Citravāhinī Saṃvāda: Dhanaṃjaya-patana and Prāya-threat
पूर्वमेव स बाणौघचैर्गाढविद्धो<र्जुनेन ह पपात सो5पि धरणीमालिड्ग्य रणमूर्थनि,राजा बश्रुवाहन युद्धस्थलमें बड़ा परिश्रम करके लड़ा था। वह भी अर्जुनके बाणसमूहोंद्वारा पहलेसे ही बहुत घायल हो चुका था। अत: पिताको मारा गया देख वह भी युद्धके मुहानेपर अचेत होकर गिर पड़ा और पृथ्वीका आलिंगन करने लगा
vaiśaṃpāyana uvāca | pūrvam eva sa bāṇaughaiḥ gāḍha-viddho 'rjunena ha papāta so 'pi dharaṇīm āliṅgya raṇa-mūrdhani |
वैशम्पायन उवाच—पूर्वमेव स अर्जुनेन बाणौघैर्गाढविद्धः; तस्मात् स अपि रणमूर्धनि धरणीमालिङ्ग्य मूर्च्छितः पपात, पितृवधदर्शनशोकात् क्षतवेदनया च पराजितः।
वैशम्पायन उवाच