Uttaṅka’s Petition for Madayantī’s Divine Earrings (Maṇikuṇḍala) — Agreement, Proof, and Vigilance
अहल्योवाच परितुष्टास्मि ते विप्र नित्यं भकत्या तवानघ । पर्याप्तमेतद् भद्गं ते गच्छ तात यथेप्सितम्,अहल्या बोली--निष्पाप ब्राह्मण! मैं तुम्हारे भक्ति-भावसे सदा संतुष्ट हूँ। बेटा! मेरे लिये इतना ही बहुत है। तुम्हारा कल्याण हो। अब तुम्हारी जहाँ इच्छा हो, जाओ
अहल्योवाच—परितुष्टास्मि ते विप्र नित्यं भक्त्या तवानघ। पर्याप्तमेतद् भद्रं ते गच्छ तात यथेप्सितम्॥
गौतम उवाच