Brahmopadeśa: Adhipatitva-kathana, Dharma-lakṣaṇa, and Kṣetra–Kṣetrajña Viveka
Book 14, Chapter 43
लक्षणं मनसो ध्यानमव्यक्त साधुलक्षणम्,मनका लक्षण ध्यान है और श्रेष्ठ पुरुषका लक्षण बाहरसे व्यक्त नहीं होता (वह स्वसंवेद्य हुआ करता है)। योगका लक्षण प्रवृति और संन्यासका लक्षण ज्ञान है। इसलिये बुद्धिमान पुरुषको चाहिये कि वह ज्ञानका आश्रय लेकर यहाँ संन्यास ग्रहण करे
lakṣaṇaṁ manaso dhyānam avyaktasādhulakṣaṇam | yogasya lakṣaṇaṁ pravṛttiḥ saṁnyāsasya lakṣaṇaṁ jñānam | tasmād buddhimān puruṣo jñānāśrayaṁ kṛtvā iha saṁnyāsaṁ gṛhṇīyāt ||
वायुरुवाच—मनसो लक्षणं ध्यानम्; साधूनां लक्षणं चाव्यक्तं, स्वसंवेद्यमेव तत्। योगस्य लक्षणं प्रवृत्तिः, संन्यासस्य लक्षणं ज्ञानम्। तस्माद् बुद्धिमान् ज्ञानमाश्रित्येह संन्यासं समाश्रयेत्॥
वायुदेव उवाच