जनक–ब्राह्मणसंवादः
Viṣaya, Mamatva, and Self-Mastery
ततो मे कश्मलस्यान्ते मति: पुनरुपस्थिता,फिर विचारके द्वारा उस मोहका नाश होनेपर मैं इस नतीजेपर पहुँचा हूँ कि कहीं भी मेरा राज्य नहीं है अथवा सर्वत्र मेरा ही राज्य है। एक दृष्टिसे यह शरीर भी मेरा नहीं है और दूसरी दृष्टिसे यह सारी पृथ्वी ही मेरी है
tato me kaśmalasyānte matiḥ punar upasthitā | vicārakeṇa mohakṣaye ’haṃ niścayam agaccham—kvacid api mama rājyaṃ nāsti athavā sarvatraiva mama rājyaṃ | ekadṛṣṭyā idaṃ śarīram api mama na, aparadṛṣṭyā iyaṃ sarvā pṛthivī mamaiva ||
ततो मे कश्मलस्यान्ते मति: पुनरुपस्थिता। विचारयतः मोहस्य नाशेऽहं निश्चयं गतः—न क्वचिद् मे राज्यं, अथवा सर्वत्रैव मे राज्यं। एकस्मिन् पक्षेऽयं देहोऽपि न मम; अपरस्मिन् पक्षे सर्वैव पृथिवी ममैव।
जनक उवाच