Arjuna’s request to Krishna and the opening of the Kāśyapa–Brāhmaṇa mokṣa discourse (Āśvamedhika-parva 16)
स हि धर्म: सुपर्याप्तो ब्रह्मण: पदवेदने । न शक्यं तन््मया भूयस्तथा वक्तुमशेषत:,क्योंकि वह धर्म ब्रह्मपदकी प्राप्ति करानेके लिये पर्याप्त था, वह सारा-का-सारा धर्म उसी रूपमें फिर दुहरा देना अब मेरे वशकी बात भी नहीं है
sa hi dharmaḥ suparyāpto brahmaṇaḥ padavedane | na śakyaṃ tanmayā bhūyas tathā vaktum aśeṣataḥ ||
स हि धर्मः सुपर्याप्तो ब्रह्मणः पदवेदने। न शक्यं तन्मया भूयस्तथा वक्तुमशेषतः॥
वायुदेव उवाच