धृतराष्ट्रस्य वनप्रस्थानानुज्ञा | Permission for Dhṛtarāṣṭra’s Forest-Retirement
परस्परस्य सुह्दद: परस्परहिते रता: । 'सज्जनो! आप और कौरव चिरकालसे एक साथ रहते आये हैं। आप दोनों एक- दूसरेके सुहृद् हैं और दोनों सदा एक-दूसरेके हितमें तत्पर रहते हैं
parasparasya suhṛdaḥ parasparahite ratāḥ |
वैशम्पायन उवाच— परस्परस्य सुहृदः परस्परहिते रताः। हे सज्जन, भवान् कौरवैश्च चिरकालादेकत्र वसथः; युवां परस्परस्य सुहृदौ, उभौ च नित्यं परस्परहिते तत्परौ।
वैशम्पायन उवाच