अश्रमवासिनां विषादः — Lament in Hastināpura after the Elders’ Forest Withdrawal
अपन बक। ] अति्ऑशाड<ह (पुत्रदर्शनपर्व) एकोनत्रिशो<5 ध्याय: 5300 बान्धवोंके शोकसे दुखी होना तथा गान्धारी और व्यासजीसे अपने मरे हुए पुत्रोंके दर्शन करनेका अनुरोध जनमेजय उवाच वनवासं गते विप्र धृतराष्ट्रे महीपतौ । सभारयें नृपशार्दूल वध्वा कुन्त्या समन्विते,जनमेजयने पूछा--ब्रह्मन!] जब अपनी धर्मपत्नी गान्धारी और बहू कुन्तीके साथ नृपश्रेष्ठ पृथ्वीपति धृतराष्ट्र वनवासके लिये चले गये, विदुरजी सिद्धिको प्राप्त होकर धर्मराज युधिष्ठिरके शरीरमें प्रविष्ट हो गये और समस्त पाण्डव आश्रममण्डलमें निवास करने लगे, उस समय परम तेजस्वी व्यासजीने जो यह कहा था कि "मैं आश्चर्यजनक घटना प्रकट करूँगा” वह किस प्रकार हुई? यह मुझे बताइये
janamejaya uvāca |
vanavāsaṃ gate vipra dhṛtarāṣṭre mahīpatau |
sabhārye nṛpaśārdūla vadhvā kuntyā samanvite ||
जनमेजय उवाच— वनवासं गते विप्र धृतराष्ट्रे महीपतौ । सभार्ये नृपशार्दूले वध्वा कुन्त्या समन्विते ॥ विदुरे चापि संसिद्धिं धर्मराजं व्यपाश्रिते । वसत्सु पाण्डुपुत्रेषु सर्वेष्वाश्रममण्डले ॥ यदुक्तं तेजसा व्यासेन “अद्भुतं दर्शयिष्यामि” इति, तत्कथं समभवत्? एतन्मे ब्रूहि ॥
जनमेजय उवाच