Chapter 85: Suvarṇasya Janma ca Pradāna-Phalam
The Origin of Gold and the Merit of Gifting
भगवती लक्ष्मीकी गौओंसे आश्रयके लिये प्रार्थना श्रीस्वाच किमेतद् व: क्षमं गावो यन्मां नेहाभिनन्दथ । नमां सम्प्रति गृह्नीध्वं कस्माद् वै दुर्लभां सतीम्,लक्ष्मीजीने कहा--गौओ! यह क्या बात है? क्या यही तुम्हारे लिये उचित है कि तुम मेरा अभिनन्दन नहीं करती? मैं सती-साध्वी हूँ, दुर्लभ हूँ। फिर भी इस समय तुम मुझे स्वीकार क्यों नहीं करती?
śrīr uvāca—kim etad vaḥ kṣamaṃ gāvo yan māṃ nehābhinandatha | na māṃ samprati gṛhṇīdhvaṃ kasmād vai durlabhāṃ satīm ||
श्रीरुवाच किमेतद्वः क्षमं गावो यन्मां नेहाभिनन्दथ । मां सम्प्रति गृह्णीध्वं कस्माद्वै दुर्लभां सतीम् ॥
भीष्म उवाच