Chapter 84: Brahmā’s Counsel on Tāraka, the Search for Agni, and the Genesis of Skanda
Kārttikeya
सर्वरत्नमयैश्रित्रैरवगाढा द्रुमोत्तमै: । जातरूपमयैश्चान्यैहुताशनसमप्रभै:,कितने ही उत्तम वृक्ष अपने मूलभागके द्वारा उन नदियोंके जलमें प्रविष्ट दिखायी देते हैं। वे सर्वरत्नमय विचित्र देखे जाते हैं। कितने ही सुवर्णमय होते हैं और दूसरे बहुत-से वृक्ष प्रज्ज्वलित अग्निके समान प्रकाशित होते हैं
sarvaratnamayaiś citrair avagāḍhā drumottamaiḥ | jātarūpamayaiś cānyai hutāśanasamaprabhaiḥ ||
व्यास उवाच—तासां नदीनाṃ तोयेषु मूलैः सुसंनिविष्टा बहवो द्रुमोत्तमाः दृश्यन्ते। केचित् सर्वरत्नमयाः विचित्रा इव प्रतिभान्ति, केचित् जातरूपमयाः, अपरे बहवो हुताशनसमप्रभया दीप्त्या प्रकाशन्ते।
व्यास उवाच