Phala of Vrata, Niyama, Svādhyāya, Dama, Satya, Brahmacarya, and Service (व्रत-नियम-स्वाध्याय-दम-सत्य-ब्रह्मचर्य-शुश्रूषा-फलप्रश्नः)
समाप्ते नियमे तस्मिन् महर्षि: पुत्रमब्रवीत् | उपस्पर्शनसक्तस्य स्वाध्यायाभिरतस्य च,उस यज्ञका नियम पूरा हो जानेपर महर्षिने अपने पुत्रसे कहा--“बेटा! मैंने समिधा, कुशा, फूल, जलका घड़ा और प्रचुर भोजन-सामग्री (फल-फूल आदि)--इन सबका संग्रह करके नदीके किनारे रख दिया और स्नान तथा वेदपाठ करने लगा। फिर उन सब वस्तुओंको भूलकर मैं यहाँ चला आया। अब तुम जाकर नदीतटसे वह सब सामान यहाँ ले आओ'
bhīṣma uvāca | samāpte niyame tasmin maharṣiḥ putram abravīt | upasparśana-saktasya svādhyāyābhiratasya ca |
समाप्ते नियमे तस्मिन् महर्षिः पुत्रमब्रवीत्। उपस्पर्शनसक्तस्य स्वाध्यायाभिरतस्य च॥ समिधः कुशपुष्पाणि जलकुम्भं च भोजनम्। नदीतीरे मया सर्वं निक्षिप्तं विस्मृतं ततः॥ इहागतोऽस्मि तद्गत्वा सर्वमादाय मेऽनघ। नदीतीरात् समानेष्य नाचिकेत इति ब्रवीत्॥
भीष्म उवाच