तदभूमिं वापि पितृभि: श्राद्धकर्म विहन्यते । जो परायी भूमिमें पितरोंके लिये श्राद्ध करता है, अथवा जो उस भूमिको पितरोंके लिये दानमें देता है, उसके वे श्राद्धकर्म और दान दोनों ही नष्ट होते (निष्फल हो जाते) हैं ।। ३३ $ई || तस्मात् क्रीत्वा महीं दद्यात् स्वल्पामपि विचक्षण:
तद्भूमिं वापि पितृभिः श्राद्धकर्म विहन्यते। तस्मात् क्रीत्वा महीं दद्यात् स्वल्पामपि विचक्षणः॥
भीष्म उवाच