दैव–पुरुषकार-प्रश्नः
Daiva–Puruṣakāra Inquiry: Fate and Human Effort
न च फलति विकर्मा जीवलोके न दैवं व्यपनयति विमार्ग नास्ति दैवे प्रभुत्वम् | गुरुमिव कृतमग्रयं कर्म संयाति दैवं नयति पुरुषकार: संचितस्तत्र तत्र,इस जीव-जगत्में उद्योगहीन मनुष्य कभी फूलता-फलता नहीं दिखायी देता। दैवमें इतनी शक्ति नहीं है कि वह उसे कुमार्गसे हटाकर सन्मार्गमें लगा दे। जैसे शिष्य गुरुको आगे करके चलता है उसी तरह दैव पुरुषार्थको ही आगे करके स्वयं उसके पीछे चलता है। संचित किया हुआ पुरुषार्थ ही दैवको जहाँ चाहता है, वहाँ-वहाँ ले जाता है
na ca phalati vikarmā jīvaloke na daivaṁ vyapanayati vimārgaṁ nāsti daive prabhutvam | gurum iva kṛtam agryaṁ karma saṁyāti daivaṁ nayati puruṣakāraḥ saṁcitas tatra tatra ||
न च फलति विकर्मा जीवलोके; न दैवं व्यपनयति विमार्गात्, नास्ति दैवे प्रभुत्वम्। गुरुमिव कृतमग्र्यं कर्म संयाति दैवं; नयति पुरुषकारः संचितस्तत्र तत्र॥
भीष्म उवाच