Vivāha-dharma: Kanyā-pradāna, Śulka, and Pāṇigrahaṇa-niṣṭhā (अनुशासन पर्व, अध्याय ४४)
क्लिश्यमानमनड्रेन त्वत्संकल्पभवेन ह । तत् सम्प्राप्तं हि मां सुभ्रु पुरा कालो$तिवर्तते,“तुम्हारा चिन्तन करनेसे मेरे हृदयमें जो काम उत्पन्न हुआ है वह मुझे बड़ा कष्ट दे रहा है। इसीसे मैं तुम्हारे निकट उपस्थित हुआ हूँ। सुन्दरी! अब देर न करो, समय बीता जा रहा है!
क्लिश्यमानमनङ्गेन त्वत्सङ्कल्पभवेन ह । तत्सम्प्राप्तं हि मां सुभ्रु पुरा कालोऽतिवर्तते ॥
भीष्म उवाच