Devaśarmā–Vipula Dialogue on Ahorātra–Ṛtu as Moral Witnesses (अनुशासन पर्व, अध्याय ४३)
विरूपो रूपवांश्वैव युवा वृद्धस्तथैव च । ब्राह्मण: क्षत्रियश्चैव वैश्य: शूद्रस्तथैव च,वे एक ही क्षणमें कुरूप और दूसरे ही क्षणमें रूपवान् हो जाते हैं। कभी जवान और कभी बूढ़े बन जाते हैं। कभी ब्राह्मण बनकर आते हैं तो कभी क्षत्रिय, वैश्य और शूद्रका रूप बना लेते हैं
विरूपो रूपवांश्चैव युवा वृद्धस्तथैव च। ब्राह्मणः क्षत्रियश्चैव वैश्यः शूद्रस्तथैव च॥
भीष्म उवाच