Aṣṭāvakra and the Woman: Disclosure, Permission, and Marital Resolution (अनुशासन पर्व, अध्याय २२)
रूयुवाच शिरसा प्रणमे विप्र प्रसादं कर्तुमहसि । भूमौ निपतमानाया: शरणं भव मेडनघ,स्त्री बोली--अनघ! विप्रवर! मैं सिर झुकाकर प्रणाम करती हूँ और आपके सामने पृथ्वीपर पड़ी हूँ। आप मुझपर कृपा करें और मुझे शरण दें
strī uvāca—śirasā praṇame vipra prasādaṃ kartum arhasi | bhūmau nipatamānāyāḥ śaraṇaṃ bhava me ’nagha ||
स्त्री उवाच— शिरसा प्रणमे विप्र, प्रसादं कर्तुमर्हसि। भूमौ निपतमानायाः शरणं भव मेऽनघ॥
अद्टावक्र उवाच