Śiva-stavarāja: Upamanyu’s Preface and Initiation of the Śarva-Nāma Enumeration
Anuśāsana-parva 17
वक्ष्ये यदुकुलश्रेष्ठ शृणुष्वावहितो मम । वरयैनं भवं देवं भक्तस्त्वं परमेश्वरम्,इन सब नामोंका आविष्कार महापुरुषोंने किया है तथा वेदोंमें दत्तचित्त रहनेवाले महर्षि तण्डिने भक्तिपूर्वक इनका संग्रह किया है। इसलिये ये सभी नाम सत्य, सिद्ध तथा सम्पूर्ण मनोरथोंके साधक हैं। विख्यात श्रेष्ठ पुरुषों तथा तत्त्वदर्शी मुनियोंने इन सभी नामोंका यथावत््रूपसे प्रतिपादन किया है। महर्षि तण्डिने ब्रह्मलोकसे मर्त्यलोकमें इन नामोंको उतारा है; इसलिये ये सत्यनाम सम्पूर्ण जगत्में आदरपूर्वक सुने गये हैं। यदुकुलतिलक श्रीकृष्ण! यह ब्रह्माजीका कहा हुआ सनातन शिव-स्तोत्र अन्य स्तोत्रोंकी अपेक्षा श्रेष्ठ है और उत्तम वेदमय है। सब स्तोत्रोंमें इसका प्रथम स्थान है। यह स्वर्गकी प्राप्ति करानेवाला, सम्पूर्ण भूतोंके लिये हितकर एवं शुभकारक है। इसका मैं आपसे वर्णन करूँगा। आप सावधान होकर मेरे मुखसे इसका श्रवण करें। आप परमेश्वर महादेवजीके भक्त हैं; अतः इस शिवस्वरूप स्तोत्रका वरण करें
vakṣye yadukulaśreṣṭha śṛṇuṣvāvahito mama | varayainaṁ bhavaṁ devaṁ bhaktas tvaṁ parameśvaram ||
वायुरुवाच—वक्ष्ये यदुकुलश्रेष्ठ शृणुष्वावहितो मम। वरयैनं भवं देवं भक्तस्त्वं परमेश्वरम्॥
वायुदेव उवाच
The verse emphasizes attentive listening to sacred instruction and recommends choosing devotion to Bhava (Śiva), presenting Śiva-praise as a worthy and spiritually efficacious path for one already devoted to the Supreme.
Vāyu addresses Kṛṣṇa, asking him to listen with full attention, and announces that he will recite a Śiva-focused hymn, urging Kṛṣṇa to accept it because of his devotion to the Supreme Lord.