अध्याय १६ — शङ्कर-उमा-वरदानम् तथा तण्डि-स्तुतिः (Śaṅkara–Umā Boon-Granting and Taṇḍi’s Hymn)
/ अपन बछ। है २ >> - यहाँ श्रीकृष्णके माँगे हुए आठ वरोंको एवं 'भविष्यति' इस वाक्यके द्वारा देनेके पश्चात् पार्वतीजी अपनी ओरसे आठ वर और देती हैं। इनमें 'अमरप्रभाव” इस सम्बोधनके द्वारा देवोपम प्रभावका दान ही पहला वरदान सूचित किया गया है। “मैं कभी झूठ नहीं बोलती” इस कथनके द्वारा “तुम भी कभी झूठ नहीं बोलोगे” यह दूसरा वर सूचित होता है। सोलह हजार रानियोंके प्राप्त होनेका वर तीसरा है। उनका प्रिय होना चौथा वर है। अक्षय धनधान्यकी प्राप्ति पाँचवाँ वर है। बान्धवोंकी प्रीति छठा
upamanyur uvāca—ṛṣir āsīt kṛte tāta taṇḍir ity eva viśrutaḥ | daśa-varṣa-sahasrāṇi tena devaḥ samādhinā ||
उपमन्युरुवाच—तात! कृते युगे तण्डिरित्येव विश्रुतो ऋषिरासीৎ। स भक्त्या समाधिना दशवर्षसहस्राणि देवं महादेवं समाराधयामास। तस्य प्राप्तं फलं तेऽहं वक्ष्यामि—शृणु।
वायुदेव उवाच
Steadfast devotion expressed through sustained meditation (samādhi) and austerity (tapas) is presented as a powerful means to attain divine grace and spiritual fruition.
Upamanyu begins recounting an ancient Kṛta-Yuga exemplar: the sage Taṇḍi, famed for worshipping Mahādeva in deep samādhi for ten thousand years, setting up the account of the boon or result he received.