Adhyāya 152 — Bhīṣma’s Authorization for Yudhiṣṭhira’s Return to the Capital (नगरप्रवेशानुज्ञा)
सा भवेद् धर्मपरमा सा भवेद् धर्मभागिनी । देववत् सततं साध्वी या भर्तरें प्रपश्यति,जिसके स्वभाव, बात-चीत और आचरण उत्तम हों, जिसको देखनेसे पतिको सुख मिलता हो, जो अपने पतिके सिवा दूसरे किसी पुरुषमें मन नहीं लगाती हो और स्वामीके समक्ष सदा प्रसन्नमुखी रहती हो, वह स्त्री धर्माचरण करनेवाली मानी गयी है। जो साध्वी स्त्री अपने स्वामीको सदा देवतुल्य समझती है, वही धर्मपरायणा और वही धर्मके फलकी भागिनी होती है
sā bhaved dharmaparamā sā bhaved dharmabhāginī | devavat satataṃ sādhvī yā bhartaraṃ prapaśyati ||
सा भवेद् धर्मपरमा सा भवेद् धर्मभागिनी। देववत् सततं साध्वी या भर्तारं प्रपश्यति॥
श्रीमहेश्वर उवाच