Śiva-nāmānukīrtana-prastāvaḥ
Prologue to the praise of Śiva and the Upamanyu testimony
जो ध्रुव (कूटस्थ), नन्दी (आनन्दमय), होता, गोप्ता (रक्षक), विश्वस्रष्टा, गार्हपत्य आदि अग्नि, मुण्डी (चूड़ारहित) और कपर्दी (जटाजूटधारी) हैं, उन भगवान् शंकरके महान् सौभाग्यका आप वर्णन कीजिये ।। वासुदेव उवाच न गति: कर्मणां शक््या वेलुमीशस्य तत्त्वत: । हिरण्यगर्भप्रमुखा देवा: सेन्द्रा महर्षय:,भगवान् श्रीकृष्णने कहा--भगवान् शंकरके कर्मोंकी गतिका यथार्थरूपसे ज्ञान होना अशक्य है। ब्रह्मा और इन्द्र आदि देवता, महर्षि तथा सूक्ष्मदर्शी आदित्य भी जिनके निवासस्थानको नहीं जानते, सत्पुरुषोंके आश्रयभूत उन भगवान् शिवके तत्त्वका ज्ञान मनुष्यमात्रको कैसे हो सकता है?
vāsudeva uvāca |
na gatiḥ karmaṇāṁ śakyā vettuṁ īśasya tattvataḥ |
hiraṇyagarbha-pramukhā devāḥ sendrā maharṣayaḥ ||
ध्रुवाय नन्दिने होत्रे गोप्त्रे विश्वसृजेऽग्नये । महाभाग्यं विभोर्ब्रूहि मुण्डिनेऽथ कपर्दिने ॥ वासुदेव उवाच—न गतिः कर्मणां शक्या वेत्तुमीशस्य तत्त्वतः । हिरण्यगर्भप्रमुखा देवा सेन्द्रा महर्षयः ॥
वासुदेव उवाच