
Śṛṅgī’s Curse on King Parikṣit (Parikṣit–Śṛṅgī–Takṣaka Causal Link)
Upa-parva: Pauloma Parva (Frame-Narrative and Early Causality Episodes)
Sauti reports that the sage’s son Śṛṅgī, upon being told by Kṛśa that King Parikṣit—while hunting, exhausted, hungry, and unable to locate his quarry—approached Śṛṅgī’s father (a vow-bound silent ascetic) and, receiving no reply, placed a dead serpent upon the ascetic’s shoulder, becomes inflamed with anger. Interpreting the act as a grave insult to a vulnerable elder, Śṛṅgī ritually empowers his speech (water-touching as a performative marker) and pronounces that Takṣaka will cause the king’s death on the seventh day. Śṛṅgī then informs his father of the curse. The father rebukes the action as contrary to ascetic dharma, arguing that kings protect the realm in which ascetics live; therefore, a king’s inadvertent offense under fatigue should be forgiven, and a rash curse constitutes youthful wrongdoing. The chapter’s technical theme is the asymmetry between momentary misconduct and irrevocable speech-acts, and the text frames governance and renunciation as interdependent ethical institutions.
Chapter Arc: Kadru’s curse hangs over the serpent race like a noose: the Nāgas, foreseeing Janamejaya’s sarpa-satra, gather in alarm to find a path of escape before the sacrificial fire begins to drink their names. → Vāsuki convenes a council with Airāvata and other dharma-minded kin, urging clear-eyed deliberation on how to break the curse. Proposals multiply—some cunning, some cruel, some desperate—revealing fractures within the Nāga community between fear-driven expediency and moral restraint. → The debate turns sharp when certain Nāgas advocate extreme sabotage and violence: defiling consecrated food with excreta, seizing or killing Janamejaya, or otherwise uprooting the sacrifice at its source—plans that promise quick relief but risk grave sin and backlash. → Dharma-hearted Nāgas object, warning that such ‘intelligence’ is actually folly—acts like brahmahatyā and sacrilege cannot be the serpent race’s salvation. The chapter closes with the council still searching for a righteous, effective remedy to the foretold doom. → With many schemes rejected as adharma, the question remains: what lawful, destined means will truly deliver the Nāgas from the fire of Janamejaya’s rite?
Verse 1
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके १ श्लोक मिलाकर कुल २६ श्लोक हैं) हि ही बक। हि मा मम सप्तत्रिशो5्ध्याय: माताके शापसे बचनेके लिये हक कि आदि नागोंका परस्पर परामश सौतिरुवाच मातु: सकाशात् त॑ शापं श्रुत्वा वै पन्नगोत्तम: । वासुकिश्चिन्तयामास शापो5यं न भवेत् कथम्,उग्रश्रवाजी कहते हैं--शौनक! माता कद्रूसे नागोंके लिये वह शाप प्राप्त हुआ सुनकर नागराज वासुकिको बड़ी चिन्ता हुई। वे सोचने लगे “किस प्रकार यह शाप दूर हो सकता है!
सौतिरुवाच—मातुः सकाशात् तं शापं श्रुत्वा वै पन्नगोत्तमः । वासुकिश्चिन्तयामास शापोऽयं न भवेत् कथम् ॥
Verse 2
ततः स मन्त्रयामास भ्रातृभि: सह सर्वश: । ऐरावतप्रभृतिभि: सर्वधर्मपरायणै:,तदनन्तर उन्होंने ऐरावत आदि सर्वधर्मपरायण बन्धुओंके साथ उस शापके विषयमें विचार किया
ततः स मन्त्रयामास भ्रातृभिः सह सर्वशः । ऐरावतप्रभृतिभिः सर्वधर्मपरायणैः ॥
Verse 3
वायुकिरुवाच अयं शापो यथोद्दिष्टो विदितं वस्तथानघा: । तस्य शापस्य मोक्षार्थ मन्त्रयित्वा यतामहे,वासुकि बोले--निष्पाप नागगण! माताने हमें जिस प्रकार यह शाप दिया है, वह सब आपलोगोंको विदित ही है। उस शापसे छूटनेके लिये क्या उपाय हो सकता है? इसके विषयमें सलाह करके हम सब लोगोंको उसके लिये प्रयत्न करना चाहिये। सब शापोंका प्रतीकार सम्भव है, परंतु जो माताके शापसे ग्रस्त हैं, उनके छूटनेका कोई उपाय नहीं है
वासुकिरुवाच—अयं शापो यथोद्दिष्टो विदितं वः तथानघाः । तस्य शापस्य मोक्षार्थं मन्त्रयित्वा यतामहे ॥
Verse 4
सर्वेषामेव शापानां प्रतिघातो हि विद्यते । नतु मात्राभिशप्तानां मोक्ष: क्वचन विद्यते,वासुकि बोले--निष्पाप नागगण! माताने हमें जिस प्रकार यह शाप दिया है, वह सब आपलोगोंको विदित ही है। उस शापसे छूटनेके लिये क्या उपाय हो सकता है? इसके विषयमें सलाह करके हम सब लोगोंको उसके लिये प्रयत्न करना चाहिये। सब शापोंका प्रतीकार सम्भव है, परंतु जो माताके शापसे ग्रस्त हैं, उनके छूटनेका कोई उपाय नहीं है
सर्वेषामेव शापानां प्रतिघातो हि विद्यते । न तु मात्राभिशप्तानां मोक्षः क्वचन विद्यते ॥
Verse 5
अव्ययस्याप्रमेयस्य सत्यस्य च तथाग्रत: । शप्ता इत्येव मे श्रुत्वा जायते हृदि वेपथु:,अविनाशी, अप्रमेय तथा सत्यस्वरूप ब्रह्माजीके आगे माताने हमें शाप दिया है--यह सुनकर ही हमारे हृदयमें कम्प छा जाता है
अव्ययस्याप्रमेयस्य सत्यस्य च तथाग्रतः । शप्ता इत्येव मे श्रुत्वा जायते हृदि वेपथुः ॥
Verse 6
नूनं सर्वविनाशो5यमस्माकं समुपागत: । न होतां सोडव्ययो देव: शपन्न्तीं प्रत्यषेधयत्,निश्चय ही यह हमारे सर्वगाशका समय आ गया है, क्योंकि अविनाशी देव भगवान् ब्रह्माने भी शाप देते समय माताको मना नहीं किया
नूनं सर्वविनाशोऽयमस्माकं समुपागतः। न हि तां शपन्तीं माताṃ देवोऽप्यविनाशी प्रत्यषेधयत्॥
Verse 7
तस्मात् सम्मन्त्रयामोड्द्य भुजजड्रानामनामयम् | यथा भवेद्धि सर्वेषां मा न: कालो5त्यगादयम्,यथा नष्ट पुरा देवा गुढमग्निं गुहागतम् । इसलिये आज हमें अच्छी तरह विचार कर लेना चाहिये कि किस उपायसे हम सभी नाग कुशलपूर्वक रह सकते हैं। अब हमें व्यर्थ समय नहीं गँवाना चाहिये। हमलोगोंमें प्राय: सब नाग बुद्धिमान् और चतुर हैं। यदि हम मिल-जुलकर सलाह करें तो इस संकटसे छूटनेका कोई उपाय ढूँढ़ निकालेंगे; जैसे पूर्वकालमें देवताओंने गुफामें छिपे हुए अग्निको खोज निकाला था
तस्मात् सम्मन्त्रयामोऽद्य भुजगानामनामयम्। यथा भवेद्धि सर्वेषां मा नः कालोऽत्यगादयम्॥ यथा नष्टं पुरा देवा गूढमग्निं गुहागतम्।
Verse 8
सर्व एव हि नस्तावद् बुद्धिमन्तो विचक्षणा: । अपि मन्त्रयमाणा हि हेतुं पश्याम मोक्षणे
सर्व एव हि नस्तावद् बुद्धिमन्तो विचक्षणाः। अपि मन्त्रयमाणा हि हेतुं पश्याम मोक्षणे॥
Verse 9
यथा स यज्ञो न भवेद् यथा वापि पराभव: । जनमेजयस्य सर्पाणां विनाशकरणाय वै,सर्पोके विनाशके लिये आरम्भ होनेवाला जनमेजयका यज्ञ जिस प्रकार टल जाय अथवा जिस तरह उसमें विघ्न पड़ जाय, वह उपाय हमें सोचना चाहिये
यथा स यज्ञो न भवेद् यथा वापि पराभवः। जनमेजयस्य सर्पाणां विनाशकरणाय वै॥
Verse 10
सौतिरुवाच तथेत्युक्त्वा तत: सर्वे काद्रवेया: समागता: । समयं चक्रिरे तत्र मन्त्रबुद्धिविशारदा:,उग्रश्रवाजी कहते हैं--शौनक! वहाँ एकत्र हुए सभी कटद्रपुत्र 'बहुत अच्छा” कहकर एक निश्चयपर पहुँच गये, क्योंकि वे नीतिका निश्चय करनेमें निपुण थे
सौतिरुवाच—तथेत्युक्त्वा ततः सर्वे काद्रवेयाः समागताः। समयं चक्रिरे तत्र मन्त्रबुद्धिविशारदाः॥
Verse 11
एके तत्राब्रुवन् नागा वयं भूत्वा द्विजर्षभा: । जनमेजयं तु भिक्षामो यज्ञस्ते न भवेदिति,उस समय वहाँ कुछ नागोंने कहा--“हमलोग श्रेष्ठ ब्राह्मण बनकर जनमेजयसे यह भिक्षा माँगें कि तुम्हारा यज्ञ न हो '
एके तत्राब्रुवन् नागा वयं भूत्वा द्विजर्षभाः । जनमेजयं तु भिक्षामो यज्ञस्ते न भवेदिति ॥
Verse 12
अपरे त्वब्रुवन् नागास्तत्र पण्डितमानिन: । मन्त्रिणोउस्य वयं सर्वे भविष्याम: सुसम्मता:,अपनेको बड़ा भारी पण्डित माननेवाले दूसरे नागोंने कहा--'हम सब लोग जनमेजयके विश्वासपात्र मन्त्री बन जायँगे
अपरे त्वब्रुवन् नागास्तत्र पण्डितमानिनः । मन्त्रिणोऽस्य वयं सर्वे भविष्यामः सुसम्मताः ॥
Verse 13
स नः प्रक्ष्यति सर्वेषु कार्येष्वर्थविनिश्चवयम् । तत्र बुद्धि प्रदास्यामो यथा यज्ञो निवर्त्स्यति,'फिर वे सभी कार्योमें अभीष्ट प्रयोजनका निश्चय करनेके लिये हमसे सलाह पूढेंगे। उस समय हम उन्हें ऐसी बुद्धि देंगे, जिससे यज्ञ होगा ही नहीं
स नः प्रक्ष्यति सर्वेषु कार्येष्वर्थविनिश्चये । तत्र बुद्धिं प्रदास्यामो यथा यज्ञो निवर्त्स्यति ॥
Verse 14
स नो बहुमतान् राजा बुद्धया बुद्धिमतां वर: । यज्ञार्थ प्रक्ष्यति व्यक्त नेति वक्ष्यामहे वयम्,“हम वहाँ बहुत विश्वस्त एवं सम्मानित होकर रहेंगे। अतः बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ राजा जनमेजय यज्ञके विषयमें हमारी सम्मति जाननेके लिये अवश्य पूछेंगे। उस समय हम स्पष्ट कह देंगे--'यज्ञ न करो”
स नो बहुमतान् राजा बुद्ध्या बुद्धिमतां वरः । यज्ञार्थं प्रक्ष्यति व्यक्तं नेति वक्ष्यामहे वयम् ॥
Verse 15
दर्शयन्तो बहून् दोषानू प्रेत्य चेह च दारुणान् । हेतुभि: कारणैश्वैव यथा यज्ञो भवेन्न सः,“हम युक्तियों और कारणोंद्वारा यह दिखायेंगे कि उस यज्ञसे इहलोक और परलोकमें अनेक भयंकर दोष प्राप्त होंगे; इससे वह यज्ञ होगा ही नहीं
दर्शयन्तो बहून् दोषान् प्रेत्य चेह च दारुणान् । हेतुभिः कारणैश्चैव यथा यज्ञो भवेन्न सः ॥
Verse 16
अथवा य उपाध्याय: क्रतोस्तस्य भविष्यति । सर्पसत्रविधानज्ञो राजकार्यहिते रत:,“अथवा जो उस यज्ञके आचार्य होंगे, जिन्हें सर्पयज्ञकी विधिका ज्ञान हो और जो राजाके कार्य एवं हितमें लगे रहते हों, उन्हें कोई सर्प जाकर डँस ले। फिर वे मर जायाँगे। यज्ञ करानेवाले आचार्यके मर जानेपर वह यज्ञ अपने-आप बंद हो जायगा
अथवा य उपाध्यायः क्रतोस्तस्य भविष्यति । सर्पसत्रविधानज्ञो राजकार्यहिते रतः । सर्पेण दष्टः स म्रियेत; तस्मिन् मृते यज्ञाध्यक्षे क्रतुरपि स्वयमेव विनश्येत् ॥
Verse 17
त॑ गत्वा दशतां कश्चिद् भुजड़: स मरिष्यति । तस्मिन् मृते यज्ञकारे क्रतु:ः स न भविष्यति,“अथवा जो उस यज्ञके आचार्य होंगे, जिन्हें सर्पयज्ञकी विधिका ज्ञान हो और जो राजाके कार्य एवं हितमें लगे रहते हों, उन्हें कोई सर्प जाकर डँस ले। फिर वे मर जायाँगे। यज्ञ करानेवाले आचार्यके मर जानेपर वह यज्ञ अपने-आप बंद हो जायगा
तं गत्वा दशतां कश्चिद् भुजङ्गः स मरिष्यति । तस्मिन् मृते यज्ञकारे क्रतुः स न भविष्यति ॥
Verse 18
ये चान्ये सर्पसत्रज्ञा भविष्यन्त्यस्य चर्त्विज: । तांश्व सर्वान् दशिष्याम: कृतमेवं भविष्यति,“आचार्यके सिवा दूसरे जो-जो ब्राह्मण सर्पयज्ञकी विधिको जानते होंगे और जनमेजयके यज्ञमें ऋत्विज् बननेवाले होंगे, उन सबको हम डँस लेंगे। इस प्रकार सारा काम बन जायगा”
ये चान्ये सर्पसत्रज्ञा भविष्यन्त्यस्य चर्त्विजः । तांश्च सर्वान् दशिष्यामः कृतमेवं भविष्यति ॥
Verse 19
अपरे त्वब्रुवन् नागा धर्मात्मानो दयालव: । अबुद्धिरेषा भवतां ब्रह्महत्या न शोभनम्,यह सुनकर दूसरे धर्मात्मा और दयालु नागोंने कहा--'ऐसा सोचना तुम्हारी मूर्खता है। ब्रह्म-हत्या कभी शुभकारक नहीं हो सकती
अपरे त्वब्रुवन् नागा धर्मात्मानो दयालवः । अबुद्धिरेषा भवतां ब्रह्महत्या न शोभनम् ॥
Verse 20
सम्यक्सद्धर्ममूला वै व्यसने शान्तिरुत्तमा । अधर्मात्तरता नाम कृत्स्नं व्यापादयेज्जगत्,'“आपत्तिकालमें शान्तिके लिये वही उपाय उत्तम माना गया है जो भलीभाँति श्रेष्ठ धर्मके अनुकूल किया गया हो। संकटसे बचनेके लिये उत्तरोत्तर अधर्म करनेकी प्रवृत्ति तो सम्पूर्ण जगत्का नाश कर डालेगी”
सम्यक्सद्धर्ममूला वै व्यसने शान्तिरुत्तमा । अधर्मात्तरता नाम कृत्स्नं व्यापादयेज्जगत् ॥
Verse 21
अपरे त्वब्रुवन् नागा: समिद्धं जातवेदसम् । वर्षैनिवापयिष्यामो मेघा भूत्वा सविद्युत:,इसपर दूसरे नाग बोल उठे--'जिस समय सर्पयज्ञके लिये अग्नि प्रजजलित होगी, उस समय हम बिजलियोंसहित मेघ बनकर पानीकी वर्षद्वारा उसे बुझा देंगे
अपरे त्वब्रुवन् नागाः— “समिद्धे जातवेदसि सर्पयज्ञार्थम्, वयं सविद्युतो मेघा भूत्वा वर्षैरेवैनं निवापयिष्यामः।”
Verse 22
खुग्भाण्डं निशि गत्वा च अपरे भुजगोत्तमा: । प्रमत्तानां हरन्त्वाशु विघ्न एवं भविष्यति,“दूसरे श्रेष्ठ नाग रातमें वहाँ जाकर असावधानीसे सोये हुए ऋत्विजोंके खुकू, खुवा और यज्ञपात्र आदि शीघ्र चुरा लावें। इस प्रकार उसमें विघ्न पड़ जायगा
खुग्भाण्डं निशि गत्वा चापरे भुजगोत्तमाः । प्रमत्तानां हरन्त्वाशु विघ्न एवं भविष्यति ॥
Verse 23
यज्ञे वा भुजगास्तस्मिज्छतशो5थ सहस्त्रश: । जनान् दशन्तु वै सर्वे नैवं त्रासो भविष्यति,“अथवा उस यज्ञमें सभी सर्प जाकर सैकड़ों और हजारों मनुष्योंको डँस लें; ऐसा करनेसे हमारे लिये भय नहीं रहेगा
यज्ञे वा भुजगास्तस्मिन् शतशोऽथ सहस्रशः । जनान् दशन्तु वै सर्वे नैवं त्रासो भविष्यति ॥
Verse 24
अथवा संस्कृतं भोज्यं दूषयन्तु भुजड़मा: । स्वेन मूत्रपुरीषेण सर्वभोज्यविनाशिना,“अथवा सर्पगण उस यज्ञके संस्कारयुक्त भोज्य पदार्थको अपने मल-मूत्रोंद्वारा, जो सब प्रकारकी भोजन-सामग्रीका विनाश करनेवाले हैं, दूषित कर दें”
अथवा संस्कृतं भोज्यं दूषयन्तु भुजगमाः । स्वेन मूत्रपुरीषेण सर्वभोज्यविनाशिना ॥
Verse 25
अपरे त्वब्रुवंस्तत्र ऋत्विजो5स्य भवामहे । यज्ञविघ्नं करिष्यामो दीयतां दक्षिणा इति
अपरे त्वब्रुवंस्तत्र— “ऋत्विजोऽस्य भवामहे । यज्ञविघ्नं करिष्यामो दीयतां दक्षिणा” इति ॥
Verse 26
अपरे त्वब्रुव॑स्तत्र जले प्रक्रीडितं नृूपम्
अपरे त्वब्रुवंस्तत्र जले प्रक्रीडितं नृपम्।
Verse 27
अपरे त्वब्रुवंस्तत्र नागा: पण्डितमानिन:,इसपर अपनेको पण्डित माननेवाले दूसरे नाग बोल उठे--“हम जनमेजयको पकड़कर डँस लेंगे।' ऐसा करनेसे तुरंत ही सब काम बन जायगा। उस राजाके मरनेपर हमारे लिये अनर्थोकी जड़ ही कट जायगी
अपरे त्वब्रुवंस्तत्र नागाः पण्डितमानिनः—“जनमेजयं गृहीत्वा दंशयिष्यामः; तथा कृते क्षणादेव सर्वं सिद्ध्यति। तस्मिन् नृपे मृतेऽस्माकमनर्थानां मूलमेव छिद्येत।”
Verse 28
दशामस्तं प्रगृह्माशु कृतमेवं भविष्यति । छिन्न मूलमनर्थानां मृते तस्मिन् भविष्यति,इसपर अपनेको पण्डित माननेवाले दूसरे नाग बोल उठे--“हम जनमेजयको पकड़कर डँस लेंगे।' ऐसा करनेसे तुरंत ही सब काम बन जायगा। उस राजाके मरनेपर हमारे लिये अनर्थोकी जड़ ही कट जायगी
दंशामस्तं प्रगृह्याशु कृतमेवं भविष्यति। छिन्नमूलमनर्थानां मृते तस्मिन् भविष्यति॥
Verse 29
एषा नो नैछिकी बुद्धि: सर्वेषामीक्षणश्रव: । अथ यन्मन्यसे राजन टद्रुतं तत् संविधीयताम्,“नेत्रोंस सुननेवाले नागराज! हम सब लोगोंकी बुद्धि तो इसी निश्चयपर पहुँची है। अब आप जैसा ठीक समझते हों, वैसा शीघ्र करें!
एषा नो नैष्ठिकी बुद्धिः सर्वेषामीक्षणश्रवः। अथ यन्मन्यसे राजन् तद्रुतं तत्संविधीयताम्॥
Verse 30
इत्युक्त्वा समुदैक्षन्त वासुकिं पन्नगोत्तमम् । वासुकिश्नापि संचिन्त्य तानुवाच भुजड्रमान्,यह कहकर वे सर्प नागराज वासुकिकी ओर देखने लगे। तब वासुकिने भी खूब सोच- विचारकर उन सर्पोंसे कहा--
इत्युक्त्वा समुदैक्षन्त वासुकिं पन्नगोत्तमम्। वासुकिरपि सञ्चिन्त्य तानुवाच भुजड्रमान्॥
Verse 31
नैषा वो नैछिकी बुद्धिर्मता कर्तु भुजड़मा: । सर्वेषामेव मे बुद्धि: पन्नगानां न रोचते,“नागगण! तुम्हारी बुद्धिने जो निश्चय किया है, वह व्यवहारमें लानेयोग्य नहीं है। इसी प्रकार मेरा विचार भी सब सर्पोंको जँच जाय, यह सम्भव नहीं है
शेष उवाच—नैषा वो नैछिकी बुद्धिर्मता कर्तुं भुजङ्गमाः। सर्वेषामेव मे बुद्धिः पन्नगानां न रोचते॥
Verse 32
कि तत्र संविधातव्यं भवतां स्याद्धितं तु यत् । श्रेय:प्रसाधनं मन््ये कश्यपस्य महात्मन:,'ऐसी दशामें क्या करना चाहिये, जो तुम्हारे लिये हितकर हो। मुझे तो महात्मा कश्यपजीको प्रसन्न करनेमें ही अपना कल्याण जान पड़ता है
किं तत्र संविधातव्यं भवतां स्याद्धितं तु यत्। श्रेयःप्रसाधनं मन्ये कश्यपस्य महात्मनः॥
Verse 33
ज्ञातिवर्गस्य सौहार्दादात्मनश्व भुजज्भमा: । न च जानाति मे बुद्धि: किंचित् कर्तु वचो हि व:,'भुजंगमो! अपने जाति-भाइयोंके और अपने हितको दृष्टिमें रखकर तुम्हारे कथनानुसार कोई भी कार्य करना मेरी समझमें नहीं आया
ज्ञातिवर्गस्य सौहार्दादात्मनश्च भुजङ्गमाः। न च जानाति मे बुद्धिः किंचित्कर्तुं वचो हि वः॥
Verse 34
मया हीद॑ विधातव्यं भवतां यद्धितं भवेत् । अनेनाहं भृशं तप्ये गुणदोषौ मदाश्रयौ,“मुझे वही काम करना है, जिसमें तुम-लोगोंका वास्तविक हित हो। इसीलिये मैं अधिक चिन्तित हूँ; क्योंकि तुम सबमें बड़ा होनेके कारण गुण और दोषका सारा उत्तरदायित्व मुझपर ही है”
मया हीदं विधातव्यं भवतां यद्धितं भवेत्। अनेनाहं भृशं तप्ये गुणदोषौ मदाश्रयौ॥
Verse 37
इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि आस्तीकपर्वणि वासुक्यादिमन्त्रणे सप्तत्रिंशो 5 ध्याय:,इस प्रकार श्रीमह्याभारत आदिपर्वके अन्तर्गत आस्तीकपर्वमें वायुकि आदि नागोंकी मन्त्रणा नामक सैतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ
इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि आस्तीकपर्वणि वासुक्यादिमन्त्रणे सप्तत्रिंशोऽध्यायः॥
Verse 83
यथा नष्ट पुरा देवा गुढमग्निं गुहागतम् । इसलिये आज हमें अच्छी तरह विचार कर लेना चाहिये कि किस उपायसे हम सभी नाग कुशलपूर्वक रह सकते हैं। अब हमें व्यर्थ समय नहीं गँवाना चाहिये। हमलोगोंमें प्राय: सब नाग बुद्धिमान् और चतुर हैं। यदि हम मिल-जुलकर सलाह करें तो इस संकटसे छूटनेका कोई उपाय ढूँढ़ निकालेंगे; जैसे पूर्वकालमें देवताओंने गुफामें छिपे हुए अग्निको खोज निकाला था
शेष उवाच—यथा पुरा देवाः गुहागतम् अन्तर्हितं वह्निं पुनरविन्दन्, तथैव वयमपि अद्य सम्यग् विचार्योपायं निर्णेतुं यत् सर्वे नागाः कुशलं सुरक्षितं च वसेयुः। व्यर्थं कालो नातिवर्त्यः। अस्माकं मध्ये प्रायः सर्वे बुद्धिमन्तो निपुणाश्च; यदि वयं समवेताः मन्त्रयेम, तर्हि अस्मात् संकटात् मोक्षोपायं नूनं प्राप्स्यामः।
Verse 256
वश्यतां च गतोडसौ न: करिष्यति यथेप्सितम् । इसके बाद अन्य सर्पोने कहा--“हम उस यज्ञमें ऋत्विज हो जायँगे और यह कहकर कि हमें मुँहमाँगी दक्षिणा दो” यज्ञमें विघ्न खड़ा कर देंगे। उस समय राजा हमारे वशमें पड़कर जैसी हमारी इच्छा होगी, वैसा करेंगे”
शेष उवाच—असौ नः वश्यतां गतः; यथेप्सितं नः करिष्यति। ततः अन्ये सर्पा ऊचुः—वयं तस्मिन् यज्ञे ऋत्विजो भविष्यामः; ‘यथेष्टां दक्षिणां देहि’ इति वदन्तो यज्ञे विघ्नं करिष्यामः। तदा राजा अस्माभिः वशीकृतः सन् यथेष्टं करिष्यति।
Verse 266
गृहमानीय बध्नीम: क्रतुरेवं भवेज्न सः । फिर अन्य नाग बोले--“जब राजा जनमेजय जल-क्रीड़ा करते हों, उस समय उन्हें वहाँसे खींचकर हम अपने घर ले आवें और बाँधकर रख लें। ऐसा करनेसे वह यज्ञ होगा ही नहीं'--
शेष उवाच—जनमेजयं राजानं जलक्रीडारतं तत्रैव गृहीत्वा, तस्मात् स्थानात् आकृष्य, अस्माकं गृहमानीय बद्ध्वा धारयामः। एवं कृते सः यज्ञो न भविष्यति।
The dilemma is proportionality and restraint: whether an impulsive insult by an exhausted king warrants an irrevocable lethal curse, and whether ascetic authority should be exercised punitively or tempered by forbearance and social responsibility.
The chapter frames anger-driven speech as ethically hazardous and socially destabilizing; it teaches that dharma includes contextual judgment, forgiveness for inadvertent harm, and recognition that political and ascetic orders sustain one another.
No explicit phalaśruti is stated in this passage; the meta-commentary is embedded in the father’s admonition, which functions as an internal ethical evaluation of the narrative and guides interpretation toward restraint and kṣamā.