Adhyaya 181
Adi ParvaAdhyaya 18128 Verses

Adhyaya 181

Ādi Parva, Adhyāya 181 — Svayaṃvara Aftermath: Arjuna–Karna Exchange and Bhīma–Śalya Contest

Upa-parva: Svayaṃvara (Pāñcālī-varaṇa) Episode — Disguised Pāṇḍavas and the Contest Aftermath

Vaiśaṃpāyana narrates a volatile post-contest scene in which brāhmaṇas and kings exchange sharp assessments and threats. Arjuna, maintaining a brāhmaṇa guise, instructs the brāhmaṇas to stand aside as observers and declares his intent to restrain the enraged kṣatriyas with rapid volleys of arrows. Arjuna and Bhīma then confront the challengers: Karṇa advances toward Arjuna in a direct contest, while Śalya engages Bhīma in close combat. Arjuna checks Karṇa with precise archery; Karṇa, impressed, questions whether Arjuna is in fact a transcendent master (dhanurveda personified, Rāma, or even divine). Arjuna replies that he is a brāhmaṇa trained in the Brahma and Indra-derived weapons under a guru’s command, and stands ready to win. Karṇa withdraws, judging the Brahma-tejas difficult to overcome. Meanwhile Bhīma overpowers and throws Śalya; notably, Bhīma does not strike further when Śalya falls, an act marked as ‘āścarya’ (remarkable restraint). The assembled kings, uncertain and alarmed, request investigation into the brāhmaṇas’ origins and propose disengagement. Kṛṣṇa intervenes diplomatically, persuading the kings to withdraw by affirming dharma-based acquisition. The crowd disperses, discussing that the arena has been ‘protected by brāhmaṇas,’ while the Pāṇḍavas, still concealed, depart with Kṛṣṇā (Draupadī). The chapter closes with Kuntī’s anxious reflections during their absence and a note of Arjuna’s return amid brāhmaṇas.

Chapter Arc: मित्र के प्रश्न से कथा का द्वार खुलता है—परम-धर्मज्ञ महर्षि वसिष्ठ ने ‘अगम्यागमन’ जैसा अधर्म क्यों किया? यह संशय श्रोता के मन में भी काँटा बनकर चुभता है। → भूख से व्याकुल कल्माषपाद (राजर्षि) निर्जन वन में भक्ष्य खोजते हुए एक ब्राह्मण-दंपति को देखता है। वे दंपति एकांत में, ऋतुकाल/संतान-इच्छा के प्रसंग में साथ हैं; भय और असहायता बढ़ती जाती है, पर राजा की क्षुधा और क्रूरता विवेक पर भारी पड़ती है। → ब्राह्मणी करुण विलाप कर राजा से पति को छोड़ देने की याचना करती है, किंतु राजा ब्राह्मण को भक्षण कर लेता है। उसी क्षण ब्राह्मणी क्रोध से कल्माषपाद को शाप देती है—यह शाप राजा के जीवन और वंश-धर्म दोनों पर अंधकार डाल देता है। → राजा शाप को बार-बार स्मरण कर तीव्र पश्चात्ताप करता है; शाप-दोष से ग्रस्त होकर वह वसिष्ठ को ‘नियोग’ के लिए नियुक्त/प्रार्थित करता है—यही वह कारण बनता है जिससे वसिष्ठ को असाधारण, विवादास्पद धर्म-मार्ग अपनाना पड़ता है। → श्रोता के संशय का उत्तर दिशा पकड़ता है, पर प्रश्न शेष रहता है—क्या शाप-पीड़ित राजा के लिए वसिष्ठ का उपाय धर्म है या धर्म की सीमा पर खड़ा विवश निर्णय?

Shlokas

Verse 1

इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपरव्वके अन्तर्गत चैत्ररथपर्वमें औवॉपाख्यानविषयक एक सौ अस्सीवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥/ १८० ॥। ऑपनआक्रात [छ। अंक एकाशीरत्याधिकशततमो< ध्याय: राजा कल्माषपादको ब्राह्मणी आंगिरसीका शाप अजुन उवाच राज्ञा कल्माषपादेन गुरी ब्रह्मविदां वरे । कारणं कि पुरस्कृत्य भार्या वै संनियोजिता,अर्जुनने पूछा--गन्धर्वराज! किस कारणको सामने रखकर राजा कल्माषपादने ब्रह्मवेत्ताओंमें श्रेष्ठ गुरु वसिष्ठजीके साथ अपनी पत्नीका नियोग कराया था?

अर्जुन उवाच—गन्धर्वराज! किं कारणं पुरस्कृत्य राजा कल्माषपादो ब्रह्मविदां वरे गुरौ वसिष्ठे स्वभार्यां नियोगार्थं संनियोजयामास?

Verse 2

जानता वै परं धर्म वसिष्ठेन महात्मना । अगम्यागमनं कस्मात्‌ कृतं तेन महर्षिणा,तथा उत्तम धर्मके ज्ञाता महात्मा महर्षि वसिष्ठने यह परस्त्रीगमनका पाप कैसे किया?

अर्जुन उवाच—महात्मा महर्षिर्वसिष्ठः परं धर्मं वेत्ति स्म; कथं तेनागम्यागमनं कृतं, परस्त्रीगमनरूपं पापं च कथं समाचरितम्?

Verse 3

अधर्मिष्ठं वसिछेन कृतं चापि पुरा सखे । एतन्मे संशयं सर्व छेत्तुमहसि पृच्छत:,सखे! पूर्वकालमें महर्षि वसिष्ठने जो यह अधर्म-कार्य किया, उसका क्या कारण है? यह मेरा संशय है, जिसे मैं पूछता हूँ। आप मेरे इन सारे संशयोंका निवारण कीजिये

अर्जुन उवाच—सखे! पुरा वसिष्ठेन यदधर्मिष्ठं कृतं श्रूयते, तस्य कारणं किम्? एष मे सर्वः संशयः; पृच्छतो मे त्वं सम्यक् छेत्तुमर्हसि।

Verse 4

गन्धर्व उवाच धनंजय निबोधेदं यन्मां त्वं परिपृच्छसि । वसिष्ठ प्रति दुर्धर्ष तथा मित्रसहं नृपम्‌,गन्धर्वने कहा--दुर्धर्ष वीर धनंजय! आप महर्षि वसिष्ठ तथा राजा मित्रसहके विषयमें जो कुछ मुझसे पूछ रहे हैं, उसका समाधान सुनिये

गन्धर्व उवाच—धनञ्जय! निबोधेदं यन्मां त्वं परिपृच्छसि। दुर्धर्ष! वसिष्ठं प्रति तथा मित्रसहं नृपं प्रति यथावृत्तं ते वक्ष्यामि।

Verse 5

कथितं ते मया सर्व यथा शप्तः स पार्थिव: । शक्तिना भरतश्रेष्ठ वासिछ्लेन महात्मना,भरतश्रेष्ठ! वसिष्ठपुत्र महात्मा शक्तिसे राजा कल्माषपादको जिस प्रकार शाप प्राप्त हुआ, वह सब प्रसंग मैं आपसे कह चुका हूँ

गन्धर्व उवाच—भरतश्रेष्ठ! यथा स पार्थिवः शक्तिना वसिष्ठपुत्रेण महात्मना शप्तः, तत्सर्वं मया ते पूर्वमेव कथितम्।

Verse 6

स तु शापवशं प्राप्त: क्रोधपर्याकुलेक्षण: । निर्जगाम पुराद्‌ राजा सहदार: परंतप:,शत्रुओंको संताप देनेवाले राजा कल्माषपाद शापके परवश हो अपनी पत्नीके साथ नगरसे बाहर निकल गये। उस समय उनकी आँखें क्रोधसे व्याप्त हो रही थीं

स तु शापवशं प्राप्तः क्रोधपर्याकुलेक्षणः । निर्जगाम पुराद् राजा सहदारः परंतपः ॥

Verse 7

अरण्यं निर्जनं गत्वा सदार: परिचक्रमे । नानामृगगणाकीर्ण नानासत्त्वसमाकुलम्‌,अपनी स्त्रीके साथ निर्जन वनमें जाकर वे चारों ओर चक्कर लगाने लगे। वह महान्‌ वन भाँति-भाँतिके मृगोंसे भरा हुआ था। उसमें नाना प्रकारके जीव-जन्तु निवास करते थे

अरण्यं निर्जनं गत्वा सदारः परिचक्रमे । नानामृगगणाकीर्णं नानासत्त्वसमाकुलम् ॥

Verse 8

नानागुल्मलताच्छन्न॑ नानाद्रुमसमावृतम्‌ | अरण्यं घोरसंनादं शापग्रस्त: परिभ्रमन्‌,अनेक प्रकारकी लताओं तथा गुल्मोंसे आच्छादित और विविध प्रकारके वृक्षोंसे आवृत वह (गहन) वन भयंकर शब्दोंसे गूँजता रहता था। शापग्रस्त राजा कल्माषपाद उसीमें भ्रमण करने लगे

नानागुल्मलताच्छन्नं नानाद्रुमसमावृतम् । अरण्यं घोरसंनादं शापग्रस्तः परिभ्रमन् ॥

Verse 9

स कदाचित क्षुधाविष्टो मृगयन्‌ भक्ष्यमात्मन: । ददर्श सुपरिक्लिष्ट: कम्मिंश्रिन्निर्जने वने,एक दिन भूखसे व्याकुल हो वे अपने लिये भोजनकी तलाश करने लगे। बहुत क्लेश उठानेके बाद उन्होंने देखा कि उस वनके किसी निर्जन प्रदेशमें एक ब्राह्मण और ब्राह्मणी मैथुनके लिये एकत्र हुए हैं। वे दोनों अभी अपनी इच्छा पूर्ण नहीं कर पाये थे, इतनेहीमें उन राक्षसाविष्ट कल्माषपादको देखकर अत्यन्त भयभीत हो (वहाँसे) भाग चले

स कदाचित् क्षुधाविष्टो मृगयन् भक्ष्यमात्मनः । ददर्श सुपरिक्लिष्टः कञ्चिद् देशं निर्जने वने ॥

Verse 10

ब्राह्मणं ब्राह्मणीं चैव मिथुनायोपसंगतौ । तौतं वीक्ष्य सुवित्रस्तावकृतार्थोी प्रधावितो,एक दिन भूखसे व्याकुल हो वे अपने लिये भोजनकी तलाश करने लगे। बहुत क्लेश उठानेके बाद उन्होंने देखा कि उस वनके किसी निर्जन प्रदेशमें एक ब्राह्मण और ब्राह्मणी मैथुनके लिये एकत्र हुए हैं। वे दोनों अभी अपनी इच्छा पूर्ण नहीं कर पाये थे, इतनेहीमें उन राक्षसाविष्ट कल्माषपादको देखकर अत्यन्त भयभीत हो (वहाँसे) भाग चले

ब्राह्मणं ब्राह्मणीं चैव मिथुनायोपसंगतौ । तौ तं वीक्ष्य सुवित्रस्तावकृतार्थौ प्रधावितौ ॥

Verse 11

तयो: प्रद्रवतोर्विप्रं जग्राह नृपतिर्बलात्‌ | दृष्टवा गृहीतं भर्तारमथ ब्राह्म॒ण्यभाषत,उन भागते हुए दम्पतिमेंसे ब्राह्मणको राजाने बलपूर्वक पकड़ लिया। पतिको राक्षसके हाथमें पड़ा देख ब्राह्मणी बोली--

As the two fled, the king seized the Brahmin by force. Seeing her husband caught in the grasp of the (Gandharva-like) captor, the Brahmin woman spoke—setting the stage for an appeal grounded in dharma, protection of the innocent, and the limits of royal power.

Verse 12

शृणु राजन्‌ मम वचो यत्‌ त्वां वक्ष्यामि सुव्रत । आदित्यवंशप्रभवस्त्वं हि लोके परिश्रुत:,“राजन! मैं आपसे जो बात कहती हूँ, उसे सुनिये। उत्तम व्रतका पालन करनेवाले नरेश! आपका जन्म सूर्यवंशमें हुआ है। आप सम्पूर्ण जगत्‌में विख्यात हैं

“Listen, O king, to my words—what I am about to tell you. O ruler of excellent vows and self-restraint, you are born of the Solar dynasty and are renowned throughout the world.”

Verse 13

अप्रमत्त: स्थितो धर्मे गुरुशुश्रूषणे रत: । शापोपहत दुर्धर्ष न पापं कर्तुमहसि,“आप रुदा प्रमादशून्य होकर धर्ममें स्थित रहनेवाले हैं। गुरुजनोंकी सेवामें सदा संलग्न रहते हैं। दुर्धर्ष वीर! यद्यपि आप इस समय शापसे ग्रस्त हैं, तो भी आपको पापकर्म नहीं करना चाहिये

Verse 14

ऋतुकाले तु सम्प्राप्ते भर्तृव्यसनकर्शिता । अकृतार्था हाहं भर्त्रा प्रसवार्थ समागता

“But when the proper season arrived, I—worn down by the calamity that had befallen my husband—came to my husband seeking the begetting of a child; yet I remained unfulfilled. Alas!”

Verse 15

एवं विक्रोशमानायास्तस्यास्तु स नृशंसवत्‌,इस प्रकार ब्राह्मगी करुण विलाप करती हुई याचना कर रही थी, तो भी जैसे व्याप्र मनचाहे मृगको मारकर खा जाता है, उसी प्रकार राजाने अत्यन्त निर्दयीकी भाँति ब्राह्यणीके पतिको खा लिया। उस समय क्रोधसे पीड़ित हुई ब्राह्मणीके नेत्रोंसे धरतीपर आँसुओंकी जो बूँदें गिरी, वे सब प्रज्वलित अग्नि बन गयीं। उस अग्निने उस स्थानको जलाकर भस्म कर दिया। तदनन्तर पतिके वियोगसे व्यथित एवं शोकसंतप्त ब्राह्मणीने रोषमें भरकर राजर्षि कल्माषपादको शाप दिया--'ओ नीच! मेरी पतिविषयक कामना अभी पूर्ण नहीं हो पायी थी, तभी तूने अत्यन्त क्रूरकी भाँति मेरे देखते-देखते आज मेरे महायशस्वी प्रियतम पतिको अपना ग्रास बना लिया है; अतः दुर्बुद्धे! तू भी मेरे शापसे पीड़ित हुआ ऋतुकालमें पत्नीके साथ समागम करते ही तत्काल प्राण त्याग देगा। जिन महर्षि वसिष्ठके पुत्रोंका तुमने संहार किया है, उन्हींसे समागम करके तेरी पत्नी पुत्र पैदा करेगी। नृूपाधम! वही पुत्र तेरा वंश चलानेवाला होगा”

Even as the brahmin woman cried out and pleaded, the king—acting with ruthless cruelty—devoured her husband, like a tiger killing and eating a desired deer. Then, tormented by anger, the tears that fell from the brahmin woman’s eyes onto the earth turned into blazing fire; that fire burned the spot to ashes. Thereafter, afflicted by separation from her husband and scorched by grief, she, filled with wrath, pronounced a curse upon the royal sage Kalmāṣapāda: “Wretch! My desire concerning my husband had not yet been fulfilled, and yet you, like a savage, have before my very eyes made my illustrious beloved husband your prey. Therefore, fool—struck by my curse—you shall die the very moment you unite with your wife during her fertile season. And the wife you have will conceive a son through union with those very sons of the great seer Vasiṣṭha whom you have slain. O basest of kings, that son alone will carry on your lineage.”

Verse 16

भर्तरें भक्षयामास व्याप्रो मृगमिवेप्सितम्‌ । तस्या: क्रोधाभिभूताया यान्यश्रूण्यपतन्‌ भुवि,इस प्रकार ब्राह्मगी करुण विलाप करती हुई याचना कर रही थी, तो भी जैसे व्याप्र मनचाहे मृगको मारकर खा जाता है, उसी प्रकार राजाने अत्यन्त निर्दयीकी भाँति ब्राह्यणीके पतिको खा लिया। उस समय क्रोधसे पीड़ित हुई ब्राह्मणीके नेत्रोंसे धरतीपर आँसुओंकी जो बूँदें गिरी, वे सब प्रज्वलित अग्नि बन गयीं। उस अग्निने उस स्थानको जलाकर भस्म कर दिया। तदनन्तर पतिके वियोगसे व्यथित एवं शोकसंतप्त ब्राह्मणीने रोषमें भरकर राजर्षि कल्माषपादको शाप दिया--'ओ नीच! मेरी पतिविषयक कामना अभी पूर्ण नहीं हो पायी थी, तभी तूने अत्यन्त क्रूरकी भाँति मेरे देखते-देखते आज मेरे महायशस्वी प्रियतम पतिको अपना ग्रास बना लिया है; अतः दुर्बुद्धे! तू भी मेरे शापसे पीड़ित हुआ ऋतुकालमें पत्नीके साथ समागम करते ही तत्काल प्राण त्याग देगा। जिन महर्षि वसिष्ठके पुत्रोंका तुमने संहार किया है, उन्हींसे समागम करके तेरी पत्नी पुत्र पैदा करेगी। नृूपाधम! वही पुत्र तेरा वंश चलानेवाला होगा”

गन्धर्व उवाच— व्याघ्रो यथा मृगं काम्यं गृहित्वा भक्षयेत् तथा । राजा ब्राह्मण्याः पतिं निर्दयः समभक्षयत् ॥ सा क्रोधाभिभूता यान्यश्रूण्यपतन् भुवि । तान्यग्निरूपाण्यभवन्, तेन तत्स्थानं दग्धं भस्मीकृतम् ॥ अथ भर्तृवियोगदुःखशोकसंतप्ता ब्राह्मणी रोषेण राजर्षिं कल्माषपादमशपत्— “अकृतार्थायाः पतिविषये मम कामनायां त्वया क्षुद्र नृशंसवत् मम पश्यतः प्रियः पतिः ग्रासीकृतः । तस्मात् मच्छापपरिविक्षतः त्वं पत्नीमृतावनुप्राप्य समागमे सद्यः प्राणान् त्यक्ष्यसि । यस्यर्षेर्वसिष्ठस्य पुत्रास्त्वया विनाशिताः, तैरेव समागम्य तव पत्नी पुत्रं जनयिष्यति; स एव तव वंशं धारयिष्यति।”

Verse 17

सोडग्नि: समभवद्‌ दीप्तस्तं च देशं व्यदीपयत्‌ । ततः सा शोकसंतप्ता भर्तृव्यसनकर्शिता,इस प्रकार ब्राह्मगी करुण विलाप करती हुई याचना कर रही थी, तो भी जैसे व्याप्र मनचाहे मृगको मारकर खा जाता है, उसी प्रकार राजाने अत्यन्त निर्दयीकी भाँति ब्राह्यणीके पतिको खा लिया। उस समय क्रोधसे पीड़ित हुई ब्राह्मणीके नेत्रोंसे धरतीपर आँसुओंकी जो बूँदें गिरी, वे सब प्रज्वलित अग्नि बन गयीं। उस अग्निने उस स्थानको जलाकर भस्म कर दिया। तदनन्तर पतिके वियोगसे व्यथित एवं शोकसंतप्त ब्राह्मणीने रोषमें भरकर राजर्षि कल्माषपादको शाप दिया--'ओ नीच! मेरी पतिविषयक कामना अभी पूर्ण नहीं हो पायी थी, तभी तूने अत्यन्त क्रूरकी भाँति मेरे देखते-देखते आज मेरे महायशस्वी प्रियतम पतिको अपना ग्रास बना लिया है; अतः दुर्बुद्धे! तू भी मेरे शापसे पीड़ित हुआ ऋतुकालमें पत्नीके साथ समागम करते ही तत्काल प्राण त्याग देगा। जिन महर्षि वसिष्ठके पुत्रोंका तुमने संहार किया है, उन्हींसे समागम करके तेरी पत्नी पुत्र पैदा करेगी। नृूपाधम! वही पुत्र तेरा वंश चलानेवाला होगा”

सोडग्निः समभवद्दीप्तस्तं च देशं व्यदीपयत् । ततः सा शोकसंतप्ता भर्तृव्यसनकर्शिता ॥ दीप्तोऽग्निः सहसा जातः सर्वं तद्देशमदीपयत् । अथ सा ब्राह्मणी शोकदग्धा भर्तृव्यसनपीडिता, दुःखेनावृतचित्ता तस्थौ ॥

Verse 18

कल्माषपादं राजर्षिमशपद्‌ ब्राह्मणी रुषा । यस्मान्ममाकृतार्थायास्त्वया क्षुद्र नृशंसवत्‌,इस प्रकार ब्राह्मगी करुण विलाप करती हुई याचना कर रही थी, तो भी जैसे व्याप्र मनचाहे मृगको मारकर खा जाता है, उसी प्रकार राजाने अत्यन्त निर्दयीकी भाँति ब्राह्यणीके पतिको खा लिया। उस समय क्रोधसे पीड़ित हुई ब्राह्मणीके नेत्रोंसे धरतीपर आँसुओंकी जो बूँदें गिरी, वे सब प्रज्वलित अग्नि बन गयीं। उस अग्निने उस स्थानको जलाकर भस्म कर दिया। तदनन्तर पतिके वियोगसे व्यथित एवं शोकसंतप्त ब्राह्मणीने रोषमें भरकर राजर्षि कल्माषपादको शाप दिया--'ओ नीच! मेरी पतिविषयक कामना अभी पूर्ण नहीं हो पायी थी, तभी तूने अत्यन्त क्रूरकी भाँति मेरे देखते-देखते आज मेरे महायशस्वी प्रियतम पतिको अपना ग्रास बना लिया है; अतः दुर्बुद्धे! तू भी मेरे शापसे पीड़ित हुआ ऋतुकालमें पत्नीके साथ समागम करते ही तत्काल प्राण त्याग देगा। जिन महर्षि वसिष्ठके पुत्रोंका तुमने संहार किया है, उन्हींसे समागम करके तेरी पत्नी पुत्र पैदा करेगी। नृूपाधम! वही पुत्र तेरा वंश चलानेवाला होगा”

कल्माषपादं राजर्षिमशपद् ब्राह्मणी रुषा । यस्मान्ममाकृतार्थायास्त्वया क्षुद्र नृशंसवत् ॥

Verse 19

प्रेक्षन्त्या भक्षितो मेडद्य प्रियो भर्ता महायशा: । तस्मात्‌ त्वमपि दुर्बुद्धे मच्छापपरिविक्षत:,इस प्रकार ब्राह्मगी करुण विलाप करती हुई याचना कर रही थी, तो भी जैसे व्याप्र मनचाहे मृगको मारकर खा जाता है, उसी प्रकार राजाने अत्यन्त निर्दयीकी भाँति ब्राह्यणीके पतिको खा लिया। उस समय क्रोधसे पीड़ित हुई ब्राह्मणीके नेत्रोंसे धरतीपर आँसुओंकी जो बूँदें गिरी, वे सब प्रज्वलित अग्नि बन गयीं। उस अग्निने उस स्थानको जलाकर भस्म कर दिया। तदनन्तर पतिके वियोगसे व्यथित एवं शोकसंतप्त ब्राह्मणीने रोषमें भरकर राजर्षि कल्माषपादको शाप दिया--'ओ नीच! मेरी पतिविषयक कामना अभी पूर्ण नहीं हो पायी थी, तभी तूने अत्यन्त क्रूरकी भाँति मेरे देखते-देखते आज मेरे महायशस्वी प्रियतम पतिको अपना ग्रास बना लिया है; अतः दुर्बुद्धे! तू भी मेरे शापसे पीड़ित हुआ ऋतुकालमें पत्नीके साथ समागम करते ही तत्काल प्राण त्याग देगा। जिन महर्षि वसिष्ठके पुत्रोंका तुमने संहार किया है, उन्हींसे समागम करके तेरी पत्नी पुत्र पैदा करेगी। नृूपाधम! वही पुत्र तेरा वंश चलानेवाला होगा”

प्रेक्षन्त्या भक्षितो मेऽद्य प्रियो भर्ता महायशाः । तस्मात् त्वमपि दुर्बुद्धे मच्छापपरिविक्षतः ॥

Verse 20

पत्नीमृतावनुप्राप्य सद्यस्त्यक्ष्यसि जीवितम्‌ । यस्य चर्षेर्वसिष्ठस्य त्वया पुत्रा विनाशिता:,इस प्रकार ब्राह्मगी करुण विलाप करती हुई याचना कर रही थी, तो भी जैसे व्याप्र मनचाहे मृगको मारकर खा जाता है, उसी प्रकार राजाने अत्यन्त निर्दयीकी भाँति ब्राह्यणीके पतिको खा लिया। उस समय क्रोधसे पीड़ित हुई ब्राह्मणीके नेत्रोंसे धरतीपर आँसुओंकी जो बूँदें गिरी, वे सब प्रज्वलित अग्नि बन गयीं। उस अग्निने उस स्थानको जलाकर भस्म कर दिया। तदनन्तर पतिके वियोगसे व्यथित एवं शोकसंतप्त ब्राह्मणीने रोषमें भरकर राजर्षि कल्माषपादको शाप दिया--'ओ नीच! मेरी पतिविषयक कामना अभी पूर्ण नहीं हो पायी थी, तभी तूने अत्यन्त क्रूरकी भाँति मेरे देखते-देखते आज मेरे महायशस्वी प्रियतम पतिको अपना ग्रास बना लिया है; अतः दुर्बुद्धे! तू भी मेरे शापसे पीड़ित हुआ ऋतुकालमें पत्नीके साथ समागम करते ही तत्काल प्राण त्याग देगा। जिन महर्षि वसिष्ठके पुत्रोंका तुमने संहार किया है, उन्हींसे समागम करके तेरी पत्नी पुत्र पैदा करेगी। नृूपाधम! वही पुत्र तेरा वंश चलानेवाला होगा”

पत्नीमृतावनुप्राप्य सद्यस्त्यक्ष्यसि जीवितम् । यस्य चर्षेर्वसिष्ठस्य त्वया पुत्रा विनाशिताः ॥

Verse 21

तेन संगम्य ते भार्या तनयं जनयिष्यति । स ते वंशकर: पुत्रो भविष्यति नृपाधम,इस प्रकार ब्राह्मगी करुण विलाप करती हुई याचना कर रही थी, तो भी जैसे व्याप्र मनचाहे मृगको मारकर खा जाता है, उसी प्रकार राजाने अत्यन्त निर्दयीकी भाँति ब्राह्यणीके पतिको खा लिया। उस समय क्रोधसे पीड़ित हुई ब्राह्मणीके नेत्रोंसे धरतीपर आँसुओंकी जो बूँदें गिरी, वे सब प्रज्वलित अग्नि बन गयीं। उस अग्निने उस स्थानको जलाकर भस्म कर दिया। तदनन्तर पतिके वियोगसे व्यथित एवं शोकसंतप्त ब्राह्मणीने रोषमें भरकर राजर्षि कल्माषपादको शाप दिया--'ओ नीच! मेरी पतिविषयक कामना अभी पूर्ण नहीं हो पायी थी, तभी तूने अत्यन्त क्रूरकी भाँति मेरे देखते-देखते आज मेरे महायशस्वी प्रियतम पतिको अपना ग्रास बना लिया है; अतः दुर्बुद्धे! तू भी मेरे शापसे पीड़ित हुआ ऋतुकालमें पत्नीके साथ समागम करते ही तत्काल प्राण त्याग देगा। जिन महर्षि वसिष्ठके पुत्रोंका तुमने संहार किया है, उन्हींसे समागम करके तेरी पत्नी पुत्र पैदा करेगी। नृूपाधम! वही पुत्र तेरा वंश चलानेवाला होगा”

The Gandharva said: “Uniting with him, your wife will conceive a son. That son will become the continuer of your lineage, O basest of kings.” In context, this statement follows a grim moral reversal: a king, driven by cruelty and appetite, violates the bounds of dharma by devouring a Brahmin, provoking the Brahmin’s wife to curse him. The verse underscores that even when a ruler falls into adharma and incurs a curse, the cosmic order still ensures continuity of lineage—yet through a path marked by transgression, retribution, and enforced consequence rather than righteous choice.

Verse 22

एवं शप्त्वा तु राजानं सा तमाज्िरसी शुभा | तस्यैव संनिधौ दीप्तं प्रविवेश हुताशनम्‌,इस प्रकार राजाको शाप देकर वह सती साध्वी आंगिरसी राजा कल्माषपादके समीप ही प्रज्वलित अग्निमें प्रवेश कर गयी

Having thus pronounced a curse upon the king, that auspicious woman of the Āṅgirasa line, right in his very presence, entered the blazing fire. The episode underscores the grave moral weight of a ruler’s wrongdoing and the uncompromising resolve of a chaste, principled woman to uphold truth and dignity—even at the cost of her own life.

Verse 23

वसिष्ठश्न महाभाग: सर्वमेतदवैक्षत । ज्ञानयोगेन महता तपसा च परंतप,शत्रुसूदन अर्जुन! महाभाग वसिष्ठजी अपनी बड़ी भारी तपस्या तथा ज्ञानयोगके प्रभावसे ये सब बातें जानते थे

The illustrious sage Vasiṣṭha perceived and understood all these matters—through the great power of disciplined knowledge (jñāna-yoga) and through austerity. The verse underscores that true insight is earned by inner discipline and spiritual practice, not by mere hearsay or worldly status.

Verse 24

मुक्तशापश्न राजर्षि: कालेन महता ततः । ऋतुकाले5भिपतितो मदयन्त्या निवारित:,दीर्घकालके पश्चात्‌ वे राजर्षि जब शापसे मुक्त हुए, तब ऋतुकालमें अपनी पत्नीके पास गये। परंतु उनकी रानी मदयन्तीने उन्हें (उक्त शापकी याद दिलाकर) रोक दिया

After a long lapse of time, the royal sage was released from the curse. When the season of fertility arrived, he approached his wife; yet Queen Madayantī restrained him, reminding him of the curse’s condition. The episode underscores the ethical demand for self-control and fidelity to a vow even when desire is legitimate and timely.

Verse 25

न हि सस्मार स नृपस्तं शापं काममोहितः । देव्या: सो5थ वच:ः श्रुत्वा सम्भ्रान्तो नृपसत्तम:,राजा कल्माषपाद कामसे मोहित हो रहे थे। इसलिये उन्हें शापका स्मरण नहीं रहा। महारानी मदयन्तीकी बात सुनकर वे नृपश्रेष्ठ बड़े सम्भ्रम (घबराहट)-में पड़ गये

For the king, deluded by desire, did not recall that curse. But when he heard the queen’s words, the best of kings became greatly agitated and confused—suddenly confronted with the moral and fateful consequence he had forgotten.

Verse 26

त॑ं शापमनुसंस्मृत्य पर्यतप्यद्‌ भृशं तदा । एतस्मात्‌ कारणाद्‌ राजा वसिष्ठ॑ संन्ययोजयत्‌ | स्वदारेषु नरश्रेष्ठ शापदोषसमन्वित:,उस शापको बार-बार याद करके उन्हें बड़ा संताप हुआ। नृपश्रेष्ठ; इसी कारण शापदोषसे युक्त राजा कल्माषपादने महर्षि वसिष्ठका अपनी पत्नीके साथ नियोग कराया

तं शापमनुसंस्मृत्य पर्यतप्यद् भृशं तदा । एतस्मात् कारणाद् राजा वसिष्ठं संन्ययोजयत् ॥ स्वदारेषु नरश्रेष्ठ शापदोषसमन्वितः ॥

Verse 146

प्रसीद नृपतिश्रेष्ठ भर्तायं मे विसृज्यताम्‌ । “मेरा ऋतुकाल प्राप्त है, मैं पतिके कष्टसे दुःख पा रही हूँ। मैं संतानकी इच्छासे पतिके समीप आयी थी और उनसे मिलकर अभी अपनी इच्छा पूर्ण नहीं कर पायी हूँ। नृपश्रेष्ठ! ऐसी दशामें आप मुझपर प्रसन्न होइये और मेरे इन पतिदेवताको छोड़ दीजिये'

प्रसीद नृपतिश्रेष्ठ भर्तायं मे विसृज्यताम् ।

Verse 181

इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि चैत्ररथपर्वणि वसिष्ठोपाख्याने एकाशीत्यधिकशततमो<ध्याय:

इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि चैत्ररथपर्वणि वसिष्ठोपाख्याने एकाशीत्यधिकशततमोऽध्यायः ।

Frequently Asked Questions

The dilemma is how to defend a dharma-validated outcome amid public challenge without triggering wider disorder: the protagonists must balance deterrence, concealment, and proportional response while facing hostile scrutiny from armed elites.

Power is ethically credible when governed by restraint and legitimacy. The narrative frames mastery (śastra/āstra skill and tejas) as subordinate to self-control and to dharma-based justification, with diplomacy completing what force begins.

No explicit phalaśruti is stated here. The meta-level emphasis appears instead through narrator framing and public reaction: recognition of dharma-aligned conduct (restraint, rightful acquisition) functions as the chapter’s implicit evaluative commentary.