
Ādi Parva 117 — Pāṇḍu’s Obsequies, Escort of the Pāṇḍavas, and Reception at Nāgasāhvaya (Hastināpura)
Upa-parva: Pāṇḍu-preta-kriyā and Hastināpura Return Episode (Ādi Parva, contextual unit around Adhyāya 117)
Vaiśaṃpāyana reports that ascetic seers, having completed Pāṇḍu’s avabhṛtha-like concluding rite, deliberate collectively and undertake custodianship of his dependents. Pāṇḍu is described as having renounced kingdom and realm to pursue tapas; after entrusting his newborn sons and wives as a protected deposit, he attains heaven. The sages set out immediately, carrying Pāṇḍu’s body, Kuntī, and the children toward Nāgasāhvaya. Kuntī’s arduous journey is narrated with an affective emphasis on maternal endurance. In Hastināpura, the populace—across gender and social strata—assembles without jealousy, motivated by dharma, to witness the arriving ascetics. Kuru elders and royals (Bhīṣma, Vidura, Dhṛtarāṣṭra’s household, Satyavatī, Gāndhārī, and others) respectfully greet the seers. A senior sage then publicly summarizes Pāṇḍu’s ascetic posture and the divine origins of the Pāṇḍavas (Yudhiṣṭhira from Dharma, Bhīma from Vāyu, Arjuna from Indra, and the twins from the Aśvins), notes Mādrī’s entry into the fire, and requests completion of the remaining rites for the bodies and the protection of the heirs. The episode closes with the sudden disappearance of the celestial groups (cāraṇas, siddhas, guhyakas), producing wonder among observers.
Chapter Arc: जनमेजय, वंश-वृत्तांत की धारा में, एक तीखा प्रश्न उठाते हैं—धृतराष्ट्र के सौ पुत्रों के ज्येष्ठ-अनुज क्रम और उनके पृथक्-पृथक् नाम क्या हैं? → वैशम्पायन नामों की माला खोलते हैं—दुर्योधन, युयुत्सु, दुःशासन, और फिर ‘दुः-’ से आरम्भ होने वाले अनेक नाम, मानो एक ही छाया के अनेक रूप; सूची बढ़ती जाती है और श्रोताओं के मन में भविष्य के संघर्ष की आहट गहराती है। → नामावली का विस्तार अपने चरम पर पहुँचता है—सौ पुत्रों की गणना-परंपरा पूर्ण होती है, और वंश-बल का यह विराट अंकन कौरव-पक्ष की संख्या, संगठन और संभावित दुराग्रह का संकेत बन जाता है। → अध्याय का निष्कर्ष ‘धृतराष्ट्रपुत्रनामकथन’ के रूप में स्थिर होता है—कौरव-पुत्रों की पहचान, क्रम और स्मृति-रेखा स्थापित कर दी जाती है, ताकि आगे की कथा में प्रत्येक नाम अपने कर्म-फल के साथ पहचाना जा सके। → यह नाम-सूची केवल परिचय नहीं—आगामी अध्यायों में इन्हीं नामों के भीतर छिपे स्वभाव, ईर्ष्या और अधिकार-लालसा किस प्रकार कुल-विनाश का कारण बनेंगे, यह प्रश्न खुला रह जाता है।
Verse 1
ऑपनआक्रा छा अर: 2 षोडशाधिकशततमोड< ध्याय: धृतराष्ट्रके सौ पुत्रोंकी नामावली जनमेजय उवाच ज्येष्ठानुज्येष्ठतां तेषां नामानि च पृथक् पृथक् । धृतराष्ट्रस्य पुत्राणामानुपूर्व्यात् प्रकीर्तय,जनमेजयने पूछा--ब्रह्मन! धृतराष्ट्रके पुत्रोंमें सबसे ज्येष्ठ कौन था? फिर उससे छोटा और उससे भी छोटा कौन था? उन सबके अलग-अलग नाम क्या थे? इन सब बातोंका क्रमश: वर्णन कीजिये
जनमेजय उवाच— ज्येष्ठानुज्येष्ठतां तेषां नामानि च पृथक् पृथक् । धृतराष्ट्रस्य पुत्राणामानुपूर्व्यात् प्रकीर्तय ॥
Verse 2
वैशम्पायन उवाच दुर्योधनो युयुत्सुश्न राजन् दुःशासनस्तथा । दुःसहो दुःशलश्चैव जलसंध: सम: सह:,वैशम्पायनजीने कहा--(जनमेजय! धूृतराष्ट्रके पुत्रोंके नाम क्रमश: ये हैं--) १. दुर्योधन, २. युयुत्सु, ३. दुश्शासन, ४. दुस्सह, ५. दुश्शल, ६. जलसंध, ७. सम, ८. सह, ९. विन्द, १०. अनुविन्द, १३१, दुर्धर्ष, १२. सुबाहु, १३. दुष्प्रधर्षण, १४. दुर्मर्षण, १५. दुर्मुख, १६. दुष्कर्ण, १७. कर्ण, १८. विविंशति, १९. विकर्ण, २०. शल, २१. सत्त्व, २२. सुलोचन, २३. चित्र, २४. उपचित्र, २५. चित्राक्ष, २६. चारुचित्रशरासन (चित्र-चाप), २७. दुर्मद, २८. दुर्विगाह, २९. विवित्सु, ३०. विकटानन (विकट), ३१. ऊर्णनाभ, ३२. सुनाभ (पद्मनाभ), ३३. नन्द, ३४. उपनन्द, ३५. चित्रबाण (चित्रबाहु), ३६. चित्रवर्मा, ३७. सुवर्मा, ३८. दुर्विरोचन, ३९. अयोबाहु, ४०. महाबाहु चित्रांग (चित्रांगद), ४१. चित्रकुण्डल (सुकुण्डल), ४२. भीमवेग, ४३. भीमबल, ४४. बलाकी, ४५. बलवर्धन (विक्रम), ४६. उग्रायुध, ४७. सुषेण, ४८. कुण्डोदर, ४९. महोदर, ५०. चित्रायुध (दृढ़ायुध), ५१. निषंगी, ५२. पाशी, ५३. वृन्दारक, ५४. दृढ़वर्मा, ५५. दृढ़क्षत्र, ५६. सोमकीर्ति, ५७. अनूदर, ५८. दृढ़सन्ध, ५९, जरासन्ध, ६०. सत्यसन्ध, ६१. सद:सुवाक् (सहख्रवाक्), ६२. उग्रश्नवा, ६३. उग्रसेन, ६४. सेनानी (सेनापति), ६५. दुष्पराजय, ६६. अपराजित, ६७. पण्डितक, ६८. विशालाक्ष, ६९. दुराधर (दुराधन), ७०. दृढ़हस्त, ७१. सुहस्त, ७२. वातवेग, ७३. सुवर्चा, ७४. आदित्यकेतु, ७५. बह्लाशी, ७६. नागदत्त, ७७. अग्रयायी (अनुयायी), ७८. कवची, ७९, क्रथन, ८०. दण्डी, ८१. दण्डधार, ८२. धनुग्रह, ८३. उग्र, ८४. भीमरथ, ८५. वीरबाहु, ८६. अलोलुप, ८७, अभय, ८८. रौद्रकर्मा, ८९. दृढ़रथाश्रय (दृढ़रथ), ९०. अनाधृष्य, ९१. कुण्डभेदी, ९२. विरावी, ९३. विचित्र कुण्डलोंसे सुशोभित प्रमथ, ९४. प्रमाथी, ९५. वीर्यवान् दीर्घरोमा (दीर्घलोचन), ९६. दीर्घबाहु, ९७. महाबाहु व्यूढोरु, ९८. कनकध्वज (कनकांगद), ९९. कुण्डाशी (कुण्डज) तथा १००. विरजा--धृतराष्ट्रके ये सौ पुत्र थे। इनके सिवा दुःशला नामक एक कन्या थी, जो सौसे अधिक थी-
वैशम्पायन उवाच— दुर्योधनो युयुत्सुश्च राजन् दुःशासनस्तथा । दुःसहो दुःशलश्चैव जलसन्धः समः सहः ॥
Verse 3
विन्दानुविन्दौ दुर्धर्ष: सुबाहुर्दुष्प्रधर्षण: । दुर्मर्षणो दुर्मुखश्न दुष्कर्ण: कर्ण एव च,वैशम्पायनजीने कहा--(जनमेजय! धूृतराष्ट्रके पुत्रोंके नाम क्रमश: ये हैं--) १. दुर्योधन, २. युयुत्सु, ३. दुश्शासन, ४. दुस्सह, ५. दुश्शल, ६. जलसंध, ७. सम, ८. सह, ९. विन्द, १०. अनुविन्द, १३१, दुर्धर्ष, १२. सुबाहु, १३. दुष्प्रधर्षण, १४. दुर्मर्षण, १५. दुर्मुख, १६. दुष्कर्ण, १७. कर्ण, १८. विविंशति, १९. विकर्ण, २०. शल, २१. सत्त्व, २२. सुलोचन, २३. चित्र, २४. उपचित्र, २५. चित्राक्ष, २६. चारुचित्रशरासन (चित्र-चाप), २७. दुर्मद, २८. दुर्विगाह, २९. विवित्सु, ३०. विकटानन (विकट), ३१. ऊर्णनाभ, ३२. सुनाभ (पद्मनाभ), ३३. नन्द, ३४. उपनन्द, ३५. चित्रबाण (चित्रबाहु), ३६. चित्रवर्मा, ३७. सुवर्मा, ३८. दुर्विरोचन, ३९. अयोबाहु, ४०. महाबाहु चित्रांग (चित्रांगद), ४१. चित्रकुण्डल (सुकुण्डल), ४२. भीमवेग, ४३. भीमबल, ४४. बलाकी, ४५. बलवर्धन (विक्रम), ४६. उग्रायुध, ४७. सुषेण, ४८. कुण्डोदर, ४९. महोदर, ५०. चित्रायुध (दृढ़ायुध), ५१. निषंगी, ५२. पाशी, ५३. वृन्दारक, ५४. दृढ़वर्मा, ५५. दृढ़क्षत्र, ५६. सोमकीर्ति, ५७. अनूदर, ५८. दृढ़सन्ध, ५९, जरासन्ध, ६०. सत्यसन्ध, ६१. सद:सुवाक् (सहख्रवाक्), ६२. उग्रश्नवा, ६३. उग्रसेन, ६४. सेनानी (सेनापति), ६५. दुष्पराजय, ६६. अपराजित, ६७. पण्डितक, ६८. विशालाक्ष, ६९. दुराधर (दुराधन), ७०. दृढ़हस्त, ७१. सुहस्त, ७२. वातवेग, ७३. सुवर्चा, ७४. आदित्यकेतु, ७५. बह्लाशी, ७६. नागदत्त, ७७. अग्रयायी (अनुयायी), ७८. कवची, ७९, क्रथन, ८०. दण्डी, ८१. दण्डधार, ८२. धनुग्रह, ८३. उग्र, ८४. भीमरथ, ८५. वीरबाहु, ८६. अलोलुप, ८७, अभय, ८८. रौद्रकर्मा, ८९. दृढ़रथाश्रय (दृढ़रथ), ९०. अनाधृष्य, ९१. कुण्डभेदी, ९२. विरावी, ९३. विचित्र कुण्डलोंसे सुशोभित प्रमथ, ९४. प्रमाथी, ९५. वीर्यवान् दीर्घरोमा (दीर्घलोचन), ९६. दीर्घबाहु, ९७. महाबाहु व्यूढोरु, ९८. कनकध्वज (कनकांगद), ९९. कुण्डाशी (कुण्डज) तथा १००. विरजा--धृतराष्ट्रके ये सौ पुत्र थे। इनके सिवा दुःशला नामक एक कन्या थी, जो सौसे अधिक थी-
विन्दानुविन्दौ दुर्धर्षः सुबाहुर्दुष्प्रधर्षणः । दुर्मर्षणो दुर्मुखश्च दुष्कर्णः कर्ण एव च ॥
Verse 4
विविंशतिर्विकर्णश्र शलः सत्त्वः सुलोचन: । चित्रोपचित्रौ चित्राक्षशक्षारुचित्रशरासन:,वैशम्पायनजीने कहा--(जनमेजय! धूृतराष्ट्रके पुत्रोंके नाम क्रमश: ये हैं--) १. दुर्योधन, २. युयुत्सु, ३. दुश्शासन, ४. दुस्सह, ५. दुश्शल, ६. जलसंध, ७. सम, ८. सह, ९. विन्द, १०. अनुविन्द, १३१, दुर्धर्ष, १२. सुबाहु, १३. दुष्प्रधर्षण, १४. दुर्मर्षण, १५. दुर्मुख, १६. दुष्कर्ण, १७. कर्ण, १८. विविंशति, १९. विकर्ण, २०. शल, २१. सत्त्व, २२. सुलोचन, २३. चित्र, २४. उपचित्र, २५. चित्राक्ष, २६. चारुचित्रशरासन (चित्र-चाप), २७. दुर्मद, २८. दुर्विगाह, २९. विवित्सु, ३०. विकटानन (विकट), ३१. ऊर्णनाभ, ३२. सुनाभ (पद्मनाभ), ३३. नन्द, ३४. उपनन्द, ३५. चित्रबाण (चित्रबाहु), ३६. चित्रवर्मा, ३७. सुवर्मा, ३८. दुर्विरोचन, ३९. अयोबाहु, ४०. महाबाहु चित्रांग (चित्रांगद), ४१. चित्रकुण्डल (सुकुण्डल), ४२. भीमवेग, ४३. भीमबल, ४४. बलाकी, ४५. बलवर्धन (विक्रम), ४६. उग्रायुध, ४७. सुषेण, ४८. कुण्डोदर, ४९. महोदर, ५०. चित्रायुध (दृढ़ायुध), ५१. निषंगी, ५२. पाशी, ५३. वृन्दारक, ५४. दृढ़वर्मा, ५५. दृढ़क्षत्र, ५६. सोमकीर्ति, ५७. अनूदर, ५८. दृढ़सन्ध, ५९, जरासन्ध, ६०. सत्यसन्ध, ६१. सद:सुवाक् (सहख्रवाक्), ६२. उग्रश्नवा, ६३. उग्रसेन, ६४. सेनानी (सेनापति), ६५. दुष्पराजय, ६६. अपराजित, ६७. पण्डितक, ६८. विशालाक्ष, ६९. दुराधर (दुराधन), ७०. दृढ़हस्त, ७१. सुहस्त, ७२. वातवेग, ७३. सुवर्चा, ७४. आदित्यकेतु, ७५. बह्लाशी, ७६. नागदत्त, ७७. अग्रयायी (अनुयायी), ७८. कवची, ७९, क्रथन, ८०. दण्डी, ८१. दण्डधार, ८२. धनुग्रह, ८३. उग्र, ८४. भीमरथ, ८५. वीरबाहु, ८६. अलोलुप, ८७, अभय, ८८. रौद्रकर्मा, ८९. दृढ़रथाश्रय (दृढ़रथ), ९०. अनाधृष्य, ९१. कुण्डभेदी, ९२. विरावी, ९३. विचित्र कुण्डलोंसे सुशोभित प्रमथ, ९४. प्रमाथी, ९५. वीर्यवान् दीर्घरोमा (दीर्घलोचन), ९६. दीर्घबाहु, ९७. महाबाहु व्यूढोरु, ९८. कनकध्वज (कनकांगद), ९९. कुण्डाशी (कुण्डज) तथा १००. विरजा--धृतराष्ट्रके ये सौ पुत्र थे। इनके सिवा दुःशला नामक एक कन्या थी, जो सौसे अधिक थी-
विविंशतिर्विकर्णश्च शलः सत्त्वः सुलोचनः । चित्रोपचित्रौ चित्राक्षश्चारुचित्रशरासनः ॥
Verse 5
दुर्मदो दुर्विगाहश्न विवित्सुर्विकटानन: । ऊर्णनाभ: सुनाभश्न तथा नन्दोपनन्दकौ,वैशम्पायनजीने कहा--(जनमेजय! धूृतराष्ट्रके पुत्रोंके नाम क्रमश: ये हैं--) १. दुर्योधन, २. युयुत्सु, ३. दुश्शासन, ४. दुस्सह, ५. दुश्शल, ६. जलसंध, ७. सम, ८. सह, ९. विन्द, १०. अनुविन्द, १३१, दुर्धर्ष, १२. सुबाहु, १३. दुष्प्रधर्षण, १४. दुर्मर्षण, १५. दुर्मुख, १६. दुष्कर्ण, १७. कर्ण, १८. विविंशति, १९. विकर्ण, २०. शल, २१. सत्त्व, २२. सुलोचन, २३. चित्र, २४. उपचित्र, २५. चित्राक्ष, २६. चारुचित्रशरासन (चित्र-चाप), २७. दुर्मद, २८. दुर्विगाह, २९. विवित्सु, ३०. विकटानन (विकट), ३१. ऊर्णनाभ, ३२. सुनाभ (पद्मनाभ), ३३. नन्द, ३४. उपनन्द, ३५. चित्रबाण (चित्रबाहु), ३६. चित्रवर्मा, ३७. सुवर्मा, ३८. दुर्विरोचन, ३९. अयोबाहु, ४०. महाबाहु चित्रांग (चित्रांगद), ४१. चित्रकुण्डल (सुकुण्डल), ४२. भीमवेग, ४३. भीमबल, ४४. बलाकी, ४५. बलवर्धन (विक्रम), ४६. उग्रायुध, ४७. सुषेण, ४८. कुण्डोदर, ४९. महोदर, ५०. चित्रायुध (दृढ़ायुध), ५१. निषंगी, ५२. पाशी, ५३. वृन्दारक, ५४. दृढ़वर्मा, ५५. दृढ़क्षत्र, ५६. सोमकीर्ति, ५७. अनूदर, ५८. दृढ़सन्ध, ५९, जरासन्ध, ६०. सत्यसन्ध, ६१. सद:सुवाक् (सहख्रवाक्), ६२. उग्रश्नवा, ६३. उग्रसेन, ६४. सेनानी (सेनापति), ६५. दुष्पराजय, ६६. अपराजित, ६७. पण्डितक, ६८. विशालाक्ष, ६९. दुराधर (दुराधन), ७०. दृढ़हस्त, ७१. सुहस्त, ७२. वातवेग, ७३. सुवर्चा, ७४. आदित्यकेतु, ७५. बह्लाशी, ७६. नागदत्त, ७७. अग्रयायी (अनुयायी), ७८. कवची, ७९, क्रथन, ८०. दण्डी, ८१. दण्डधार, ८२. धनुग्रह, ८३. उग्र, ८४. भीमरथ, ८५. वीरबाहु, ८६. अलोलुप, ८७, अभय, ८८. रौद्रकर्मा, ८९. दृढ़रथाश्रय (दृढ़रथ), ९०. अनाधृष्य, ९१. कुण्डभेदी, ९२. विरावी, ९३. विचित्र कुण्डलोंसे सुशोभित प्रमथ, ९४. प्रमाथी, ९५. वीर्यवान् दीर्घरोमा (दीर्घलोचन), ९६. दीर्घबाहु, ९७. महाबाहु व्यूढोरु, ९८. कनकध्वज (कनकांगद), ९९. कुण्डाशी (कुण्डज) तथा १००. विरजा--धृतराष्ट्रके ये सौ पुत्र थे। इनके सिवा दुःशला नामक एक कन्या थी, जो सौसे अधिक थी-
वैशम्पायन उवाच— (जनमेजय) धृतराष्ट्रस्य पुत्रेषु दुर्मदः दुर्विगाहश्च विवित्सुर्विकटाननः । ऊर्णनाभः सुनाभश्च तथा नन्दोपनन्दकौ च ॥
Verse 6
वैशम्पायनजीने कहा--(जनमेजय! धूृतराष्ट्रके पुत्रोंके नाम क्रमश: ये हैं--) १. दुर्योधन, २. युयुत्सु, ३. दुश्शासन, ४. दुस्सह, ५. दुश्शल, ६. जलसंध, ७. सम, ८. सह, ९. विन्द, १०. अनुविन्द, १३१, दुर्धर्ष, १२. सुबाहु, १३. दुष्प्रधर्षण, १४. दुर्मर्षण, १५. दुर्मुख, १६. दुष्कर्ण, १७. कर्ण, १८. विविंशति, १९. विकर्ण, २०. शल, २१. सत्त्व, २२. सुलोचन, २३. चित्र, २४. उपचित्र, २५. चित्राक्ष, २६. चारुचित्रशरासन (चित्र-चाप), २७. दुर्मद, २८. दुर्विगाह, २९. विवित्सु, ३०. विकटानन (विकट), ३१. ऊर्णनाभ, ३२. सुनाभ (पद्मनाभ), ३३. नन्द, ३४. उपनन्द, ३५. चित्रबाण (चित्रबाहु), ३६. चित्रवर्मा, ३७. सुवर्मा, ३८. दुर्विरोचन, ३९. अयोबाहु, ४०. महाबाहु चित्रांग (चित्रांगद), ४१. चित्रकुण्डल (सुकुण्डल), ४२. भीमवेग, ४३. भीमबल, ४४. बलाकी, ४५. बलवर्धन (विक्रम), ४६. उग्रायुध, ४७. सुषेण, ४८. कुण्डोदर, ४९. महोदर, ५०. चित्रायुध (दृढ़ायुध), ५१. निषंगी, ५२. पाशी, ५३. वृन्दारक, ५४. दृढ़वर्मा, ५५. दृढ़क्षत्र, ५६. सोमकीर्ति, ५७. अनूदर, ५८. दृढ़सन्ध, ५९, जरासन्ध, ६०. सत्यसन्ध, ६१. सद:सुवाक् (सहख्रवाक्), ६२. उग्रश्नवा, ६३. उग्रसेन, ६४. सेनानी (सेनापति), ६५. दुष्पराजय, ६६. अपराजित, ६७. पण्डितक, ६८. विशालाक्ष, ६९. दुराधर (दुराधन), ७०. दृढ़हस्त, ७१. सुहस्त, ७२. वातवेग, ७३. सुवर्चा, ७४. आदित्यकेतु, ७५. बह्लाशी, ७६. नागदत्त, ७७. अग्रयायी (अनुयायी), ७८. कवची, ७९, क्रथन, ८०. दण्डी, ८१. दण्डधार, ८२. धनुग्रह, ८३. उग्र, ८४. भीमरथ, ८५. वीरबाहु, ८६. अलोलुप, ८७, अभय, ८८. रौद्रकर्मा, ८९. दृढ़रथाश्रय (दृढ़रथ), ९०. अनाधृष्य, ९१. कुण्डभेदी, ९२. विरावी, ९३. विचित्र कुण्डलोंसे सुशोभित प्रमथ, ९४. प्रमाथी, ९५. वीर्यवान् दीर्घरोमा (दीर्घलोचन), ९६. दीर्घबाहु, ९७. महाबाहु व्यूढोरु, ९८. कनकध्वज (कनकांगद), ९९. कुण्डाशी (कुण्डज) तथा १००. विरजा--धृतराष्ट्रके ये सौ पुत्र थे। इनके सिवा दुःशला नामक एक कन्या थी, जो सौसे अधिक थी-
वैशम्पायन उवाच— जनमेजय, धृतराष्ट्रस्य पुत्राणां नामानि क्रमशः शृणु— दुर्योधनः युयुत्सुः दुःशासनः दुःसहः दुःशला जलसन्धः समः सहः विन्दः अनुविन्दः दुर्धर्षः सुबाहुः दुष्प्रधर्षणः दुर्मर्षणः दुर्मुखः दुष्कर्णः कर्णः विविंशतिः विकर्णः शलः सत्त्वः सुलोचनः चित्रः उपचित्रः चित्राक्षः चारुचित्रशरासनः दुर्मदः दुर्विगाहः विवित्सुः विकटाननः ऊर्णनाभः सुनाभः नन्दः उपनन्दः चित्रबाणः चित्रवर्मा सुवर्मा दुर्विरोचनः अयोबाहुः महाबाहुः चित्राङ्गः चित्रकुण्डलः भीमवेगः भीमबलः बलाकी बलवर्धनः उग्रायुधः सुषेणः कुण्डोदरः महोदरः चित्रायुधः निषङ्गी पाशी वृन्दारकः दृढवर्मा दृढक्षत्रः सोमकीर्तिः अनूदरः दृढसन्धः जरासन्धः सत्यसन्धः सदःसुवाक् उग्रश्रवाः उग्रसेनः सेनानी दुष्पराजयः अपराजितः पण्डितकः विशालाक्षः दुराधरः दृढहस्तः सुहस्तः वातवेगः सुवर्चाः आदित्यकेतुः बह्लाशी नागदत्तः अग्रयायी कवची क्रथनः दण्डी दण्डधारः धनुग्रहः उग्रः भीमरथः वीरबाहुः अलोलुपः अभयः रौद्रकर्मा दृढरथाश्रयः अनाधृष्यः कुण्डभेदी विरावी प्रमथः प्रमाथी दीर्घरोमा दीर्घबाहुः व्यूढोरुः कनकध्वजः कुण्डाशी विरजा च। एते धृतराष्ट्रस्य शतं पुत्राः; तेषां चापि दुःशला नाम दुहिता एका, शतादधिकेति।
Verse 7
चित्रबाणश्षित्रवर्मा सुवर्मा दुर्विरोचन: । अयोबाहुर्महाबाहुभ्रित्राज्ञश्चित्रकुण्डल: ।। भीमवेगो भीमबलो बलाकी बलवर्धन: । उग्रायुध: सुषेणश्न॒ कुण्डोदरमहोदरौ,वैशम्पायनजीने कहा--(जनमेजय! धूृतराष्ट्रके पुत्रोंके नाम क्रमश: ये हैं--) १. दुर्योधन, २. युयुत्सु, ३. दुश्शासन, ४. दुस्सह, ५. दुश्शल, ६. जलसंध, ७. सम, ८. सह, ९. विन्द, १०. अनुविन्द, १३१, दुर्धर्ष, १२. सुबाहु, १३. दुष्प्रधर्षण, १४. दुर्मर्षण, १५. दुर्मुख, १६. दुष्कर्ण, १७. कर्ण, १८. विविंशति, १९. विकर्ण, २०. शल, २१. सत्त्व, २२. सुलोचन, २३. चित्र, २४. उपचित्र, २५. चित्राक्ष, २६. चारुचित्रशरासन (चित्र-चाप), २७. दुर्मद, २८. दुर्विगाह, २९. विवित्सु, ३०. विकटानन (विकट), ३१. ऊर्णनाभ, ३२. सुनाभ (पद्मनाभ), ३३. नन्द, ३४. उपनन्द, ३५. चित्रबाण (चित्रबाहु), ३६. चित्रवर्मा, ३७. सुवर्मा, ३८. दुर्विरोचन, ३९. अयोबाहु, ४०. महाबाहु चित्रांग (चित्रांगद), ४१. चित्रकुण्डल (सुकुण्डल), ४२. भीमवेग, ४३. भीमबल, ४४. बलाकी, ४५. बलवर्धन (विक्रम), ४६. उग्रायुध, ४७. सुषेण, ४८. कुण्डोदर, ४९. महोदर, ५०. चित्रायुध (दृढ़ायुध), ५१. निषंगी, ५२. पाशी, ५३. वृन्दारक, ५४. दृढ़वर्मा, ५५. दृढ़क्षत्र, ५६. सोमकीर्ति, ५७. अनूदर, ५८. दृढ़सन्ध, ५९, जरासन्ध, ६०. सत्यसन्ध, ६१. सद:सुवाक् (सहख्रवाक्), ६२. उग्रश्नवा, ६३. उग्रसेन, ६४. सेनानी (सेनापति), ६५. दुष्पराजय, ६६. अपराजित, ६७. पण्डितक, ६८. विशालाक्ष, ६९. दुराधर (दुराधन), ७०. दृढ़हस्त, ७१. सुहस्त, ७२. वातवेग, ७३. सुवर्चा, ७४. आदित्यकेतु, ७५. बह्लाशी, ७६. नागदत्त, ७७. अग्रयायी (अनुयायी), ७८. कवची, ७९, क्रथन, ८०. दण्डी, ८१. दण्डधार, ८२. धनुग्रह, ८३. उग्र, ८४. भीमरथ, ८५. वीरबाहु, ८६. अलोलुप, ८७, अभय, ८८. रौद्रकर्मा, ८९. दृढ़रथाश्रय (दृढ़रथ), ९०. अनाधृष्य, ९१. कुण्डभेदी, ९२. विरावी, ९३. विचित्र कुण्डलोंसे सुशोभित प्रमथ, ९४. प्रमाथी, ९५. वीर्यवान् दीर्घरोमा (दीर्घलोचन), ९६. दीर्घबाहु, ९७. महाबाहु व्यूढोरु, ९८. कनकध्वज (कनकांगद), ९९. कुण्डाशी (कुण्डज) तथा १००. विरजा--धृतराष्ट्रके ये सौ पुत्र थे। इनके सिवा दुःशला नामक एक कन्या थी, जो सौसे अधिक थी-
चित्रबाणश्चित्रवर्मा सुवर्मा दुर्विरोचनः । अयोबाहुर्महाबाहुश्च चित्रकुण्डल एव च ॥ भीमवेगो भीमबलो बलाकी बलवर्धनः । उग्रायुधः सुषेणश्च कुण्डोदरमहोदरौ ॥
Verse 8
वैशम्पायनजीने कहा--(जनमेजय! धूृतराष्ट्रके पुत्रोंके नाम क्रमश: ये हैं--) १. दुर्योधन, २. युयुत्सु, ३. दुश्शासन, ४. दुस्सह, ५. दुश्शल, ६. जलसंध, ७. सम, ८. सह, ९. विन्द, १०. अनुविन्द, १३१, दुर्धर्ष, १२. सुबाहु, १३. दुष्प्रधर्षण, १४. दुर्मर्षण, १५. दुर्मुख, १६. दुष्कर्ण, १७. कर्ण, १८. विविंशति, १९. विकर्ण, २०. शल, २१. सत्त्व, २२. सुलोचन, २३. चित्र, २४. उपचित्र, २५. चित्राक्ष, २६. चारुचित्रशरासन (चित्र-चाप), २७. दुर्मद, २८. दुर्विगाह, २९. विवित्सु, ३०. विकटानन (विकट), ३१. ऊर्णनाभ, ३२. सुनाभ (पद्मनाभ), ३३. नन्द, ३४. उपनन्द, ३५. चित्रबाण (चित्रबाहु), ३६. चित्रवर्मा, ३७. सुवर्मा, ३८. दुर्विरोचन, ३९. अयोबाहु, ४०. महाबाहु चित्रांग (चित्रांगद), ४१. चित्रकुण्डल (सुकुण्डल), ४२. भीमवेग, ४३. भीमबल, ४४. बलाकी, ४५. बलवर्धन (विक्रम), ४६. उग्रायुध, ४७. सुषेण, ४८. कुण्डोदर, ४९. महोदर, ५०. चित्रायुध (दृढ़ायुध), ५१. निषंगी, ५२. पाशी, ५३. वृन्दारक, ५४. दृढ़वर्मा, ५५. दृढ़क्षत्र, ५६. सोमकीर्ति, ५७. अनूदर, ५८. दृढ़सन्ध, ५९, जरासन्ध, ६०. सत्यसन्ध, ६१. सद:सुवाक् (सहख्रवाक्), ६२. उग्रश्नवा, ६३. उग्रसेन, ६४. सेनानी (सेनापति), ६५. दुष्पराजय, ६६. अपराजित, ६७. पण्डितक, ६८. विशालाक्ष, ६९. दुराधर (दुराधन), ७०. दृढ़हस्त, ७१. सुहस्त, ७२. वातवेग, ७३. सुवर्चा, ७४. आदित्यकेतु, ७५. बह्लाशी, ७६. नागदत्त, ७७. अग्रयायी (अनुयायी), ७८. कवची, ७९, क्रथन, ८०. दण्डी, ८१. दण्डधार, ८२. धनुग्रह, ८३. उग्र, ८४. भीमरथ, ८५. वीरबाहु, ८६. अलोलुप, ८७, अभय, ८८. रौद्रकर्मा, ८९. दृढ़रथाश्रय (दृढ़रथ), ९०. अनाधृष्य, ९१. कुण्डभेदी, ९२. विरावी, ९३. विचित्र कुण्डलोंसे सुशोभित प्रमथ, ९४. प्रमाथी, ९५. वीर्यवान् दीर्घरोमा (दीर्घलोचन), ९६. दीर्घबाहु, ९७. महाबाहु व्यूढोरु, ९८. कनकध्वज (कनकांगद), ९९. कुण्डाशी (कुण्डज) तथा १००. विरजा--धृतराष्ट्रके ये सौ पुत्र थे। इनके सिवा दुःशला नामक एक कन्या थी, जो सौसे अधिक थी-
वैशम्पायन उवाच— जनमेजय, धृतराष्ट्रस्य पुत्राणां नामानि क्रमशः शृणु— (यथोक्तानि) … एते धृतराष्ट्रस्य शतं पुत्राः; तेषां चापि दुःशला नाम दुहिता एका, शतादधिकेति।
Verse 9
वैशम्पायनजीने कहा--(जनमेजय! धूृतराष्ट्रके पुत्रोंके नाम क्रमश: ये हैं--) १. दुर्योधन, २. युयुत्सु, ३. दुश्शासन, ४. दुस्सह, ५. दुश्शल, ६. जलसंध, ७. सम, ८. सह, ९. विन्द, १०. अनुविन्द, १३१, दुर्धर्ष, १२. सुबाहु, १३. दुष्प्रधर्षण, १४. दुर्मर्षण, १५. दुर्मुख, १६. दुष्कर्ण, १७. कर्ण, १८. विविंशति, १९. विकर्ण, २०. शल, २१. सत्त्व, २२. सुलोचन, २३. चित्र, २४. उपचित्र, २५. चित्राक्ष, २६. चारुचित्रशरासन (चित्र-चाप), २७. दुर्मद, २८. दुर्विगाह, २९. विवित्सु, ३०. विकटानन (विकट), ३१. ऊर्णनाभ, ३२. सुनाभ (पद्मनाभ), ३३. नन्द, ३४. उपनन्द, ३५. चित्रबाण (चित्रबाहु), ३६. चित्रवर्मा, ३७. सुवर्मा, ३८. दुर्विरोचन, ३९. अयोबाहु, ४०. महाबाहु चित्रांग (चित्रांगद), ४१. चित्रकुण्डल (सुकुण्डल), ४२. भीमवेग, ४३. भीमबल, ४४. बलाकी, ४५. बलवर्धन (विक्रम), ४६. उग्रायुध, ४७. सुषेण, ४८. कुण्डोदर, ४९. महोदर, ५०. चित्रायुध (दृढ़ायुध), ५१. निषंगी, ५२. पाशी, ५३. वृन्दारक, ५४. दृढ़वर्मा, ५५. दृढ़क्षत्र, ५६. सोमकीर्ति, ५७. अनूदर, ५८. दृढ़सन्ध, ५९, जरासन्ध, ६०. सत्यसन्ध, ६१. सद:सुवाक् (सहख्रवाक्), ६२. उग्रश्नवा, ६३. उग्रसेन, ६४. सेनानी (सेनापति), ६५. दुष्पराजय, ६६. अपराजित, ६७. पण्डितक, ६८. विशालाक्ष, ६९. दुराधर (दुराधन), ७०. दृढ़हस्त, ७१. सुहस्त, ७२. वातवेग, ७३. सुवर्चा, ७४. आदित्यकेतु, ७५. बह्लाशी, ७६. नागदत्त, ७७. अग्रयायी (अनुयायी), ७८. कवची, ७९, क्रथन, ८०. दण्डी, ८१. दण्डधार, ८२. धनुग्रह, ८३. उग्र, ८४. भीमरथ, ८५. वीरबाहु, ८६. अलोलुप, ८७, अभय, ८८. रौद्रकर्मा, ८९. दृढ़रथाश्रय (दृढ़रथ), ९०. अनाधृष्य, ९१. कुण्डभेदी, ९२. विरावी, ९३. विचित्र कुण्डलोंसे सुशोभित प्रमथ, ९४. प्रमाथी, ९५. वीर्यवान् दीर्घरोमा (दीर्घलोचन), ९६. दीर्घबाहु, ९७. महाबाहु व्यूढोरु, ९८. कनकध्वज (कनकांगद), ९९. कुण्डाशी (कुण्डज) तथा १००. विरजा--धृतराष्ट्रके ये सौ पुत्र थे। इनके सिवा दुःशला नामक एक कन्या थी, जो सौसे अधिक थी-
वैशम्पायन उवाच— जनमेजय, धृतराष्ट्रस्य पुत्राणां नामानि क्रमशः (यथोक्तानि) … एते धृतराष्ट्रस्य शतं पुत्राः; तेषां चापि दुःशला नाम दुहिता एका।
Verse 10
चित्रायुधो निषद्गी च पाशी वृन्दारकस्तथा । दृढवर्मा दृढक्षत्र: सोमकीर्तिरनूदर: ।। दृढ्सन्धो जरासन्ध: सत्यसन्ध: सद:सुवाक् । उम्रश्नवा उग्रसेन: सेनानीर्दुष्पराजय: ।। अपराजित: पण्डितको विशालाक्षो दुराधर: । दृढहस्त: सुहस्तश्न॒ वातवेगसुवर्चसौ,वैशम्पायनजीने कहा--(जनमेजय! धूृतराष्ट्रके पुत्रोंके नाम क्रमश: ये हैं--) १. दुर्योधन, २. युयुत्सु, ३. दुश्शासन, ४. दुस्सह, ५. दुश्शल, ६. जलसंध, ७. सम, ८. सह, ९. विन्द, १०. अनुविन्द, १३१, दुर्धर्ष, १२. सुबाहु, १३. दुष्प्रधर्षण, १४. दुर्मर्षण, १५. दुर्मुख, १६. दुष्कर्ण, १७. कर्ण, १८. विविंशति, १९. विकर्ण, २०. शल, २१. सत्त्व, २२. सुलोचन, २३. चित्र, २४. उपचित्र, २५. चित्राक्ष, २६. चारुचित्रशरासन (चित्र-चाप), २७. दुर्मद, २८. दुर्विगाह, २९. विवित्सु, ३०. विकटानन (विकट), ३१. ऊर्णनाभ, ३२. सुनाभ (पद्मनाभ), ३३. नन्द, ३४. उपनन्द, ३५. चित्रबाण (चित्रबाहु), ३६. चित्रवर्मा, ३७. सुवर्मा, ३८. दुर्विरोचन, ३९. अयोबाहु, ४०. महाबाहु चित्रांग (चित्रांगद), ४१. चित्रकुण्डल (सुकुण्डल), ४२. भीमवेग, ४३. भीमबल, ४४. बलाकी, ४५. बलवर्धन (विक्रम), ४६. उग्रायुध, ४७. सुषेण, ४८. कुण्डोदर, ४९. महोदर, ५०. चित्रायुध (दृढ़ायुध), ५१. निषंगी, ५२. पाशी, ५३. वृन्दारक, ५४. दृढ़वर्मा, ५५. दृढ़क्षत्र, ५६. सोमकीर्ति, ५७. अनूदर, ५८. दृढ़सन्ध, ५९, जरासन्ध, ६०. सत्यसन्ध, ६१. सद:सुवाक् (सहख्रवाक्), ६२. उग्रश्नवा, ६३. उग्रसेन, ६४. सेनानी (सेनापति), ६५. दुष्पराजय, ६६. अपराजित, ६७. पण्डितक, ६८. विशालाक्ष, ६९. दुराधर (दुराधन), ७०. दृढ़हस्त, ७१. सुहस्त, ७२. वातवेग, ७३. सुवर्चा, ७४. आदित्यकेतु, ७५. बह्लाशी, ७६. नागदत्त, ७७. अग्रयायी (अनुयायी), ७८. कवची, ७९, क्रथन, ८०. दण्डी, ८१. दण्डधार, ८२. धनुग्रह, ८३. उग्र, ८४. भीमरथ, ८५. वीरबाहु, ८६. अलोलुप, ८७, अभय, ८८. रौद्रकर्मा, ८९. दृढ़रथाश्रय (दृढ़रथ), ९०. अनाधृष्य, ९१. कुण्डभेदी, ९२. विरावी, ९३. विचित्र कुण्डलोंसे सुशोभित प्रमथ, ९४. प्रमाथी, ९५. वीर्यवान् दीर्घरोमा (दीर्घलोचन), ९६. दीर्घबाहु, ९७. महाबाहु व्यूढोरु, ९८. कनकध्वज (कनकांगद), ९९. कुण्डाशी (कुण्डज) तथा १००. विरजा--धृतराष्ट्रके ये सौ पुत्र थे। इनके सिवा दुःशला नामक एक कन्या थी, जो सौसे अधिक थी-
वैशम्पायन उवाच—धृतराष्ट्रस्य पुत्रेषु एतेऽपि राजकुमाराः—चित्रायुधो निषङ्गी च पाशी वृन्दारकस्तथा। दृढवर्मा दृढक्षत्रः सोमकीर्तिरनूदरः॥ दृढसन्धो जरासन्धः सत्यसन्धः सदःसुवाक्। उग्रश्नवा उग्रसेनः सेनानीर्दुष्पराजयः॥ अपराजितः पण्डितकः विशालाक्षो दुराधरः। दृढहस्तः सुहस्तश्च वातवेगसुवर्चसौ॥
Verse 11
आदित्यकेतुर्बह्नाशी नागदत्तो5ग्रयाय्यपि । कवची क्रथन: दण्डी दण्डधारो धरनुग्रह:,वैशम्पायनजीने कहा--(जनमेजय! धूृतराष्ट्रके पुत्रोंके नाम क्रमश: ये हैं--) १. दुर्योधन, २. युयुत्सु, ३. दुश्शासन, ४. दुस्सह, ५. दुश्शल, ६. जलसंध, ७. सम, ८. सह, ९. विन्द, १०. अनुविन्द, १३१, दुर्धर्ष, १२. सुबाहु, १३. दुष्प्रधर्षण, १४. दुर्मर्षण, १५. दुर्मुख, १६. दुष्कर्ण, १७. कर्ण, १८. विविंशति, १९. विकर्ण, २०. शल, २१. सत्त्व, २२. सुलोचन, २३. चित्र, २४. उपचित्र, २५. चित्राक्ष, २६. चारुचित्रशरासन (चित्र-चाप), २७. दुर्मद, २८. दुर्विगाह, २९. विवित्सु, ३०. विकटानन (विकट), ३१. ऊर्णनाभ, ३२. सुनाभ (पद्मनाभ), ३३. नन्द, ३४. उपनन्द, ३५. चित्रबाण (चित्रबाहु), ३६. चित्रवर्मा, ३७. सुवर्मा, ३८. दुर्विरोचन, ३९. अयोबाहु, ४०. महाबाहु चित्रांग (चित्रांगद), ४१. चित्रकुण्डल (सुकुण्डल), ४२. भीमवेग, ४३. भीमबल, ४४. बलाकी, ४५. बलवर्धन (विक्रम), ४६. उग्रायुध, ४७. सुषेण, ४८. कुण्डोदर, ४९. महोदर, ५०. चित्रायुध (दृढ़ायुध), ५१. निषंगी, ५२. पाशी, ५३. वृन्दारक, ५४. दृढ़वर्मा, ५५. दृढ़क्षत्र, ५६. सोमकीर्ति, ५७. अनूदर, ५८. दृढ़सन्ध, ५९, जरासन्ध, ६०. सत्यसन्ध, ६१. सद:सुवाक् (सहख्रवाक्), ६२. उग्रश्नवा, ६३. उग्रसेन, ६४. सेनानी (सेनापति), ६५. दुष्पराजय, ६६. अपराजित, ६७. पण्डितक, ६८. विशालाक्ष, ६९. दुराधर (दुराधन), ७०. दृढ़हस्त, ७१. सुहस्त, ७२. वातवेग, ७३. सुवर्चा, ७४. आदित्यकेतु, ७५. बह्लाशी, ७६. नागदत्त, ७७. अग्रयायी (अनुयायी), ७८. कवची, ७९, क्रथन, ८०. दण्डी, ८१. दण्डधार, ८२. धनुग्रह, ८३. उग्र, ८४. भीमरथ, ८५. वीरबाहु, ८६. अलोलुप, ८७, अभय, ८८. रौद्रकर्मा, ८९. दृढ़रथाश्रय (दृढ़रथ), ९०. अनाधृष्य, ९१. कुण्डभेदी, ९२. विरावी, ९३. विचित्र कुण्डलोंसे सुशोभित प्रमथ, ९४. प्रमाथी, ९५. वीर्यवान् दीर्घरोमा (दीर्घलोचन), ९६. दीर्घबाहु, ९७. महाबाहु व्यूढोरु, ९८. कनकध्वज (कनकांगद), ९९. कुण्डाशी (कुण्डज) तथा १००. विरजा--धृतराष्ट्रके ये सौ पुत्र थे। इनके सिवा दुःशला नामक एक कन्या थी, जो सौसे अधिक थी-
आदित्यकेतुर्बह्लाशी नागदत्तोऽग्रयाय्यपि। कवची क्रथनः दण्डी दण्डधारो धनुग्रहः॥
Verse 12
उग्रभीमरथौ वीरौ वीरबाहुरलोलुप: । अभयो रीौद्रकर्मा च तथा दृढरथाश्रय:,वैशम्पायनजीने कहा--(जनमेजय! धूृतराष्ट्रके पुत्रोंके नाम क्रमश: ये हैं--) १. दुर्योधन, २. युयुत्सु, ३. दुश्शासन, ४. दुस्सह, ५. दुश्शल, ६. जलसंध, ७. सम, ८. सह, ९. विन्द, १०. अनुविन्द, १३१, दुर्धर्ष, १२. सुबाहु, १३. दुष्प्रधर्षण, १४. दुर्मर्षण, १५. दुर्मुख, १६. दुष्कर्ण, १७. कर्ण, १८. विविंशति, १९. विकर्ण, २०. शल, २१. सत्त्व, २२. सुलोचन, २३. चित्र, २४. उपचित्र, २५. चित्राक्ष, २६. चारुचित्रशरासन (चित्र-चाप), २७. दुर्मद, २८. दुर्विगाह, २९. विवित्सु, ३०. विकटानन (विकट), ३१. ऊर्णनाभ, ३२. सुनाभ (पद्मनाभ), ३३. नन्द, ३४. उपनन्द, ३५. चित्रबाण (चित्रबाहु), ३६. चित्रवर्मा, ३७. सुवर्मा, ३८. दुर्विरोचन, ३९. अयोबाहु, ४०. महाबाहु चित्रांग (चित्रांगद), ४१. चित्रकुण्डल (सुकुण्डल), ४२. भीमवेग, ४३. भीमबल, ४४. बलाकी, ४५. बलवर्धन (विक्रम), ४६. उग्रायुध, ४७. सुषेण, ४८. कुण्डोदर, ४९. महोदर, ५०. चित्रायुध (दृढ़ायुध), ५१. निषंगी, ५२. पाशी, ५३. वृन्दारक, ५४. दृढ़वर्मा, ५५. दृढ़क्षत्र, ५६. सोमकीर्ति, ५७. अनूदर, ५८. दृढ़सन्ध, ५९, जरासन्ध, ६०. सत्यसन्ध, ६१. सद:सुवाक् (सहख्रवाक्), ६२. उग्रश्नवा, ६३. उग्रसेन, ६४. सेनानी (सेनापति), ६५. दुष्पराजय, ६६. अपराजित, ६७. पण्डितक, ६८. विशालाक्ष, ६९. दुराधर (दुराधन), ७०. दृढ़हस्त, ७१. सुहस्त, ७२. वातवेग, ७३. सुवर्चा, ७४. आदित्यकेतु, ७५. बह्लाशी, ७६. नागदत्त, ७७. अग्रयायी (अनुयायी), ७८. कवची, ७९, क्रथन, ८०. दण्डी, ८१. दण्डधार, ८२. धनुग्रह, ८३. उग्र, ८४. भीमरथ, ८५. वीरबाहु, ८६. अलोलुप, ८७, अभय, ८८. रौद्रकर्मा, ८९. दृढ़रथाश्रय (दृढ़रथ), ९०. अनाधृष्य, ९१. कुण्डभेदी, ९२. विरावी, ९३. विचित्र कुण्डलोंसे सुशोभित प्रमथ, ९४. प्रमाथी, ९५. वीर्यवान् दीर्घरोमा (दीर्घलोचन), ९६. दीर्घबाहु, ९७. महाबाहु व्यूढोरु, ९८. कनकध्वज (कनकांगद), ९९. कुण्डाशी (कुण्डज) तथा १००. विरजा--धृतराष्ट्रके ये सौ पुत्र थे। इनके सिवा दुःशला नामक एक कन्या थी, जो सौसे अधिक थी-
उग्रभीमरथौ वीरौ वीरबाहुरलोलुपः। अभयो रौद्रकर्मा च तथा दृढरथाश्रयः॥
Verse 13
अनाधृष्य: कुण्डभेदी विरावी चित्रकुण्डल: । प्रमथश्न प्रमाथी च दीर्घरोमश्न वीर्यवान्,वैशम्पायनजीने कहा--(जनमेजय! धूृतराष्ट्रके पुत्रोंके नाम क्रमश: ये हैं--) १. दुर्योधन, २. युयुत्सु, ३. दुश्शासन, ४. दुस्सह, ५. दुश्शल, ६. जलसंध, ७. सम, ८. सह, ९. विन्द, १०. अनुविन्द, १३१, दुर्धर्ष, १२. सुबाहु, १३. दुष्प्रधर्षण, १४. दुर्मर्षण, १५. दुर्मुख, १६. दुष्कर्ण, १७. कर्ण, १८. विविंशति, १९. विकर्ण, २०. शल, २१. सत्त्व, २२. सुलोचन, २३. चित्र, २४. उपचित्र, २५. चित्राक्ष, २६. चारुचित्रशरासन (चित्र-चाप), २७. दुर्मद, २८. दुर्विगाह, २९. विवित्सु, ३०. विकटानन (विकट), ३१. ऊर्णनाभ, ३२. सुनाभ (पद्मनाभ), ३३. नन्द, ३४. उपनन्द, ३५. चित्रबाण (चित्रबाहु), ३६. चित्रवर्मा, ३७. सुवर्मा, ३८. दुर्विरोचन, ३९. अयोबाहु, ४०. महाबाहु चित्रांग (चित्रांगद), ४१. चित्रकुण्डल (सुकुण्डल), ४२. भीमवेग, ४३. भीमबल, ४४. बलाकी, ४५. बलवर्धन (विक्रम), ४६. उग्रायुध, ४७. सुषेण, ४८. कुण्डोदर, ४९. महोदर, ५०. चित्रायुध (दृढ़ायुध), ५१. निषंगी, ५२. पाशी, ५३. वृन्दारक, ५४. दृढ़वर्मा, ५५. दृढ़क्षत्र, ५६. सोमकीर्ति, ५७. अनूदर, ५८. दृढ़सन्ध, ५९, जरासन्ध, ६०. सत्यसन्ध, ६१. सद:सुवाक् (सहख्रवाक्), ६२. उग्रश्नवा, ६३. उग्रसेन, ६४. सेनानी (सेनापति), ६५. दुष्पराजय, ६६. अपराजित, ६७. पण्डितक, ६८. विशालाक्ष, ६९. दुराधर (दुराधन), ७०. दृढ़हस्त, ७१. सुहस्त, ७२. वातवेग, ७३. सुवर्चा, ७४. आदित्यकेतु, ७५. बह्लाशी, ७६. नागदत्त, ७७. अग्रयायी (अनुयायी), ७८. कवची, ७९, क्रथन, ८०. दण्डी, ८१. दण्डधार, ८२. धनुग्रह, ८३. उग्र, ८४. भीमरथ, ८५. वीरबाहु, ८६. अलोलुप, ८७, अभय, ८८. रौद्रकर्मा, ८९. दृढ़रथाश्रय (दृढ़रथ), ९०. अनाधृष्य, ९१. कुण्डभेदी, ९२. विरावी, ९३. विचित्र कुण्डलोंसे सुशोभित प्रमथ, ९४. प्रमाथी, ९५. वीर्यवान् दीर्घरोमा (दीर्घलोचन), ९६. दीर्घबाहु, ९७. महाबाहु व्यूढोरु, ९८. कनकध्वज (कनकांगद), ९९. कुण्डाशी (कुण्डज) तथा १००. विरजा--धृतराष्ट्रके ये सौ पुत्र थे। इनके सिवा दुःशला नामक एक कन्या थी, जो सौसे अधिक थी-
अनाधृष्यः कुण्डभेदी विरावी चित्रकुण्डलः। प्रमथश्च प्रमाथी च दीर्घरोमा च वीर्यवान्॥
Verse 14
दीर्घबाहुर्महाबाहुर्व्यूडोरु: कनकध्वज: । कुण्डाशी विरजाश्वैव दुःशला च शताधिका,वैशम्पायनजीने कहा--(जनमेजय! धूृतराष्ट्रके पुत्रोंके नाम क्रमश: ये हैं--) १. दुर्योधन, २. युयुत्सु, ३. दुश्शासन, ४. दुस्सह, ५. दुश्शल, ६. जलसंध, ७. सम, ८. सह, ९. विन्द, १०. अनुविन्द, १३१, दुर्धर्ष, १२. सुबाहु, १३. दुष्प्रधर्षण, १४. दुर्मर्षण, १५. दुर्मुख, १६. दुष्कर्ण, १७. कर्ण, १८. विविंशति, १९. विकर्ण, २०. शल, २१. सत्त्व, २२. सुलोचन, २३. चित्र, २४. उपचित्र, २५. चित्राक्ष, २६. चारुचित्रशरासन (चित्र-चाप), २७. दुर्मद, २८. दुर्विगाह, २९. विवित्सु, ३०. विकटानन (विकट), ३१. ऊर्णनाभ, ३२. सुनाभ (पद्मनाभ), ३३. नन्द, ३४. उपनन्द, ३५. चित्रबाण (चित्रबाहु), ३६. चित्रवर्मा, ३७. सुवर्मा, ३८. दुर्विरोचन, ३९. अयोबाहु, ४०. महाबाहु चित्रांग (चित्रांगद), ४१. चित्रकुण्डल (सुकुण्डल), ४२. भीमवेग, ४३. भीमबल, ४४. बलाकी, ४५. बलवर्धन (विक्रम), ४६. उग्रायुध, ४७. सुषेण, ४८. कुण्डोदर, ४९. महोदर, ५०. चित्रायुध (दृढ़ायुध), ५१. निषंगी, ५२. पाशी, ५३. वृन्दारक, ५४. दृढ़वर्मा, ५५. दृढ़क्षत्र, ५६. सोमकीर्ति, ५७. अनूदर, ५८. दृढ़सन्ध, ५९, जरासन्ध, ६०. सत्यसन्ध, ६१. सद:सुवाक् (सहख्रवाक्), ६२. उग्रश्नवा, ६३. उग्रसेन, ६४. सेनानी (सेनापति), ६५. दुष्पराजय, ६६. अपराजित, ६७. पण्डितक, ६८. विशालाक्ष, ६९. दुराधर (दुराधन), ७०. दृढ़हस्त, ७१. सुहस्त, ७२. वातवेग, ७३. सुवर्चा, ७४. आदित्यकेतु, ७५. बह्लाशी, ७६. नागदत्त, ७७. अग्रयायी (अनुयायी), ७८. कवची, ७९, क्रथन, ८०. दण्डी, ८१. दण्डधार, ८२. धनुग्रह, ८३. उग्र, ८४. भीमरथ, ८५. वीरबाहु, ८६. अलोलुप, ८७, अभय, ८८. रौद्रकर्मा, ८९. दृढ़रथाश्रय (दृढ़रथ), ९०. अनाधृष्य, ९१. कुण्डभेदी, ९२. विरावी, ९३. विचित्र कुण्डलोंसे सुशोभित प्रमथ, ९४. प्रमाथी, ९५. वीर्यवान् दीर्घरोमा (दीर्घलोचन), ९६. दीर्घबाहु, ९७. महाबाहु व्यूढोरु, ९८. कनकध्वज (कनकांगद), ९९. कुण्डाशी (कुण्डज) तथा १००. विरजा--धृतराष्ट्रके ये सौ पुत्र थे। इनके सिवा दुःशला नामक एक कन्या थी, जो सौसे अधिक थी-
दीर्घबाहुर्महाबाहुर्व्यूढोरुः कनकध्वजः। कुण्डाशी विरजाश्चैव दुःशला च शताधिका॥
Verse 15
इति पुत्रशतं राजन् कन्या चैव शताधिका । नामधेयानुपूर्व्येण विद्धि जन्मक्रमं नृप,राजन! इस प्रकार धृतराष्ट्रके सौ पुत्र और उन सौके अतिरिक्त एक कन्या बतायी गयी। राजन! जिस क्रमसे इनके नाम लिये गये हैं, उसी क्रमसे इनका जन्म हुआ समझो
इति पुत्रशतं राजन् कन्या चैव शताधिका । नामधेयानुपूर्व्येण विद्धि जन्मक्रमं नृप ॥
Verse 16
सर्वे त्वतिरथा: शूरा: सर्वे युद्धविशारदा: । सर्वे वेदविदश्नैव सर्वे सर्वास्त्रकोविदा:,ये सभी अतिरथी शूरवीर थे। सबने युद्धविद्यामें निपुणता प्राप्त कर ली थी। सब-के- सब वेदोंके विद्वान् तथा सम्पूर्ण अस्त्रविद्याके मर्मज्ञ थे
सर्वे त्वतिरथाः शूराः सर्वे युद्धविशारदाः । सर्वे वेदविदश्चैव सर्वे सर्वास्त्रकोविदाः ॥
Verse 17
सर्वेषामनुरूपाश्न कृता दारा महीपते । धृतराष्ट्रेण समये परीक्ष्य विधिवन्नूप,जनमेजय! राजा धृतराष्ट्रने समयपर भलीभाँति जाँच-पड़ताल करके अपने सभी पुत्रोंका उनके योग्य स्त्रियोंक साथ विवाह कर दिया। भरतश्रेष्ठ! महाराज धुृतराष्ट्रने विवाहके योग्य समय आनेपर अपनी पुत्री दुःशलाका राजा जयद्रथके साथ विधिपूर्वक विवाह किया
सर्वेषामनुरूपाश्च कृता दाराः महीपते । धृतराष्ट्रेण समये परीक्ष्य विधिवन्नृप ॥
Verse 18
दुःशलां चापि समये धृतराष्ट्रो नराधिप: । जयद्रथाय प्रददौ विधिना भरतर्षभ,जनमेजय! राजा धृतराष्ट्रने समयपर भलीभाँति जाँच-पड़ताल करके अपने सभी पुत्रोंका उनके योग्य स्त्रियोंक साथ विवाह कर दिया। भरतश्रेष्ठ! महाराज धुृतराष्ट्रने विवाहके योग्य समय आनेपर अपनी पुत्री दुःशलाका राजा जयद्रथके साथ विधिपूर्वक विवाह किया
दुःशलां चापि समये धृतराष्ट्रो नराधिपः । जयद्रथाय प्रददौ विधिना भरतर्षभ ॥
Verse 115
इस प्रकार श्रीमह्याभारत आदिपर्वके अन्तर्गत सम्भवपर्वमें दुःशलाकी उत्पत्तिसे सम्बन्ध रखनेवाला एक सौ पंद्रहवाँ अध्याय पूरा हुआ
इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि सम्भवपर्वणि दुःशलोत्पत्तिसम्बन्धो नाम पञ्चदशोत्तरशततमोऽध्यायः समाप्तः ॥
Verse 116
इति श्रीमहा भारते आदिपर्वणि सम्भवपर्वणि धृतराष्ट्रपुत्रनामकथने षोडशाधिकशततमोड<ध्याय:
इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि सम्भवपर्वणि धृतराष्ट्रपुत्रनामकथने षोडशाधिकशततमोऽध्यायः।
The ethical tension concerns custodial responsibility after a king’s renunciation and death: how the polity must protect widows and minor heirs while maintaining ritual correctness and political legitimacy.
The chapter presents dharma as institutional care: social harmony is sustained when authority figures and communities treat vulnerable dependents as a sacred trust and align governance with shared ritual norms.
No explicit phalaśruti is stated here; the meta-function is archival legitimation—publicly recording lineage, rites, and guardianship to anchor later political claims within a dharmic narrative.